पूनम शर्मा
पहले बांग्लादेश, अब नेपाल। दक्षिण एशिया में भारत लगातार अस्थिरता से घिरा हुआ दिखाई दे रहा है। हाल ही में नेपाल में हुए हिंसक प्रदर्शनों ने यह साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया केवल कनेक्टिविटी का साधन नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों के लिए रेजीम-चेंज (सरकार बदलने) का हथियार भी बन चुका है। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली reportedly दुबई रवाना हो चुके हैं और उनके कई मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है। यह स्थिति केवल नेपाल के आंतरिक संकट का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की गहरी भूमिका बताई जा रही है।
सोशल मीडिया का हथियारकरण
नेपाल में हुए प्रदर्शनों का संगठन उसी तरह किया गया जैसा बांग्लादेश और ट्यूनीशिया में हुआ था। फेसबुक और अन्य अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल छात्रों और युवाओं को सड़कों पर लाने के लिए किया गया। प्रदर्शनकारियों ने संसद तक घेराव किया, हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और पुलिस से झड़पें हुईं। बच्चों तक के मारे जाने की खबरें आईं।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार होता है, या बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हमले होते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) चुप क्यों रहती है? लेकिन नेपाल जैसे देशों में अचानक उसकी “सक्रियता” क्यों बढ़ जाती है? इसका उत्तर है – पश्चिमी देशों की विदेश नीति।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार: उपकरण या न्याय?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को अक्सर अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों का “टूल” कहा जाता है। जब भी किसी देश की सरकार पश्चिमी हितों के खिलाफ जाती है, वहां मानवाधिकारों के नाम पर आंदोलन खड़े किए जाते हैं। दक्षिण अमेरिका में यह बार-बार देखा गया – वेनेज़ुएला से लेकर चिली तक। वहीं, ब्रिटेन और फ्रांस में मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग्स या कन्वर्ज़न से जुड़े गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन होते हैं, लेकिन वहां संयुक्त राष्ट्र की कोई “चिंता” नहीं दिखती।
नेपाल में भी यही हुआ। ओली सरकार का झुकाव चीन की ओर था। ऐसे में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने पुराने तरीके अपनाए – सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए दबाव बनाना।
नेपाल की बदलती धार्मिक-सामाजिक तस्वीर
नेपाल कभी दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। लेकिन धीरे-धीरे वहां मस्जिदें और चर्च बढ़ते गए। काठमांडू जैसे शहरों में आज मस्जिदों और गिरिजाघरों की भरमार है, जबकि कुछ दशक पहले ऐसा नहीं था। यह परिवर्तन केवल धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी है। क्रिश्चियन मिशनरी और इस्लामी संगठनों की पैठ ने नेपाल के समाज को बदला है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने खुद भारत को आगाह किया था कि इन प्रदर्शनों में आईएसआई और आतंकी संगठन जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद की भी भूमिका रही है। ये संगठन नेपाल को भारत में घुसपैठ के लिए लॉन्चिंग पैड की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अमेरिका बनाम चीन: नेपाल का मोर्चा
नेपाल की राजनीति में चीन का प्रभाव लंबे समय से रहा है, विशेषकर वामपंथी सरकारों के दौर में। लेकिन हालिया प्रदर्शनों और ओली की दुबई पलायन से स्पष्ट है कि इस बार चीन ने कोई मदद नहीं की। सवाल उठता है – क्यों?
दरअसल, अमेरिका और चीन के बीच नेपाल अब नया संघर्षक्षेत्र बन चुका है। अमेरिका का उद्देश्य नेपाल में ऐसा शासन स्थापित करना है जो चीन-विरोधी हो। चीन, फिलहाल, चुप है लेकिन इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि वह नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता से दूरी बनाना चाहता है।
भारत के लिए चेतावनी
नेपाल की यह स्थिति भारत के लिए बेहद चिंताजनक है। अगर नेपाल अस्थिर होता है तो उसका सीधा असर भारत की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा पर पड़ेगा। खुली सीमाओं के चलते आतंकवादी, हथियार और अवैध धर्मांतरण नेटवर्क भारत में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं।
इतिहास बताता है कि महाभारत काल से भारत की सुरक्षा नीति केवल सीमाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि उससे हजारों किलोमीटर दूर तक प्रभाव बनाए रखने की थी। आज भी भारत को उसी दृष्टि से अपनी रणनीति तैयार करनी होगी।
सोशल मीडिया पर नियंत्रण की आवश्यकता
भारत ने किसान आंदोलन के दौरान भी देखा कि कैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल देश को अस्थिर करने में हुआ। अंतरराष्ट्रीय हस्तियों और संगठनों ने “टूलकिट्स” के जरिए विरोध प्रदर्शनों को हवा दी।
इसलिए भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी डिजिटल संप्रभुता को सुरक्षित करे। अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल मनोरंजन या संवाद का साधन नहीं हैं, बल्कि डेटा कलेक्शन और इंटेलिजेंस के उपकरण हैं। जैसे पहले ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (BBC) का इस्तेमाल पश्चिमी नैरेटिव फैलाने के लिए होता था, वैसे ही आज फेसबुक और अन्य अमेरिकी कंपनियां वही काम कर रही हैं।
भविष्य की दिशा
नेपाल की अस्थिरता भारत को दो बातें सिखाती है:
आंतरिक सुरक्षा – सीमावर्ती इलाकों में बढ़ते मस्जिदों और चर्चों, आईएसआई की घुसपैठ और कन्वर्ज़न गतिविधियों पर सख्त निगरानी जरूरी है।
विदेश नीति – भारत को अमेरिका और चीन दोनों के खेल से बचते हुए नेपाल में स्थिर, हिंदू पहचान वाली सरकार का समर्थन करना चाहिए।
ओली का पलायन यह संकेत है कि नेपाल की राजनीति अब नए मोड़ पर खड़ी है। यदि सही समय पर भारत रणनीतिक कदम नहीं उठाता, तो वह अपने चारों ओर फैलती अस्थिरता के जाल में फंस सकता है।
निष्कर्ष:
नेपाल का संकट केवल नेपाल का संकट नहीं है। यह बांग्लादेश, ट्यूनीशिया, म्यांमार जैसे उदाहरणों की कड़ी है जहाँ सोशल मीडिया और मानवाधिकारों की आड़ लेकर पश्चिमी शक्तियाँ सरकारें गिराती और नए समीकरण बनाती हैं। भारत को यह समझना होगा कि उसकी सुरक्षा सीमाओं से बहुत आगे तक फैली हुई है। इसलिए सोशल मीडिया कंट्रोल, डिजिटल स्वतंत्रता और सीमाओं से परे रणनीतिक उपस्थिति – यही भारत की सुरक्षा का नया मंत्र होना चाहिए।