पूनम शर्मा
17 मार्च 1970 का दिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे आज भी “सैंबाड़ी हत्याकांड” के नाम से याद किया जाता है। यह घटना हुगली जिले के बर्दवान क्षेत्र स्थित सैं परिवार के घर में हुई थी और उस समय राज्य में राजनीतिक हिंसा अपने चरम पर थी। संयुक्त मोर्चा (यूनाइटेड फ्रंट) सरकार के दौर में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा था, जिसके परिणामस्वरूप कई हिंसक घटनाएं सामने आईं।
सैं परिवार कांग्रेस समर्थक माना जाता था। परिवार के दो युवा सदस्य, प्रणब सैं और मलय सैं, राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय थे। 17 मार्च 1970 को कथित रूप से एक उग्र भीड़ ने सैं परिवार के घर पर हमला किया। प्रत्यक्षदर्शियों और बाद के विवरणों के अनुसार, हमलावरों ने घर में घुसकर परिवार के सदस्यों को निशाना बनाया। इस हमले में प्रणब सैं और मलय सैं की निर्मम हत्या कर दी गई।
इस घटना का सबसे मार्मिक और भयावह पहलू परिवार की माता, मृगनयनी देवी, के साथ कथित रूप से किया गया अमानवीय व्यवहार था। अपने पुत्रों की हत्या के बाद उन्हें जबरन रक्त से सने चावल खाने के लिए मजबूर किया गया। यह आरोप वर्षों से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है और इस घटना को राजनीतिक क्रूरता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इस बात पर व्यापक सहमति है कि परिवार को अत्यंत अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा।
1969 और 1970 का कालखंड पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर था। संयुक्त मोर्चा सरकार में शामिल दलों के बीच मतभेद बढ़ रहे थे और सड़कों पर राजनीतिक संघर्ष आम हो गया था। इसी अवधि में बमबाजी, राजनीतिक हत्याएं और हिंसक झड़पें बढ़ीं। कई इतिहासकारों का मानना है कि यह समय राज्य में संगठित राजनीतिक हिंसा के विस्तार का दौर था। सैंबाड़ी कांड इसी व्यापक राजनीतिक संघर्ष की पृष्ठभूमि में घटित हुआ।
सैंबाड़ी हत्याकांड का प्रभाव तत्कालीन राजनीति पर भी पड़ा। घटना के बाद कांग्रेस ने इसे राज्य में कानून-व्यवस्था की विफलता और राजनीतिक आतंक का उदाहरण बताया। बाद के वर्षों में यह घटना पश्चिम बंगाल की राजनीति में बार-बार चर्चा का विषय बनी रही। कई राजनीतिक नेताओं ने सैं परिवार से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की और इस घटना को लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया।
आज, सैंबाड़ी हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं माना जाता, बल्कि यह उस दौर की राजनीतिक कटुता और वैचारिक संघर्ष की भयावह परिणति का प्रतीक है। यह घटना याद दिलाती है कि जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता लोकतांत्रिक सीमाओं को पार कर हिंसा का रूप ले लेती है, तब उसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों और परिवारों को उठाना पड़ता है।
पाँच दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी सैंबाड़ी का नाम पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्मृति में एक ऐसे घाव के रूप में मौजूद है, जो लोकतंत्र में सहिष्णुता, संवाद और शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता की याद दिलाता है। यह घटना इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जिन्हें केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है।