भारत के खिलाफ छद्म युद्ध: सीमाओं पर अमेरिकी गतिविधियां
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और देश के भीतर अशांति की साजिश
पूनम शर्मा
भारत की सीमाओं पर हाल के वर्षों में बढ़ी अमेरिकी गतिविधियों, बांग्लादेश और मिजोरम बॉर्डर पर अमेरिकी नागरिकों की उपस्थिति, और CJP जैसे आंदोलनों की रणनीति के गहरे मायने हैं। मैट्यू वान डाइक और जॉर्डन ब्राउन जैसे अमेरिकी नागरिकों का सीमापार पकड़ा जाना, सिलीहट (बांग्लादेश) और मिजोरम सीमा क्षेत्र में अमेरिकी सेना की नियमित गतिविधियां, और भारत विरोधी आतंकी-सामाजिक गठजोड़ संकेत देते हैं कि यह सब एक लंबी, बहुस्तरीय योजना का हिस्सा हो सकता है, जिसका उद्देश्य भारतीय व्यवस्था में अस्थिरता पैदा करना है।
सीमाओं पर अमेरिकी उपस्थिति: संयोग नहीं, रणनीति
अमेरिकियों की बांग्लादेश-मिजोरम सीमा के पास गतिविधियां, खासकर सिलीहट क्षेत्र में, केवल सैन्य अभ्यास नहीं हैं। कई बार अमेरिकी सेना वहां ‘रेगुलर एक्सरसाइज’ के नाम पर मौजूद रहती है, लेकिन बार-बार अमेरिकी नागरिकों का पकड़ा जाना, सवाल खड़े करता है।
ऐसी गतिविधियां केवल सीमित सैन्य अभ्यास तक ही नहीं हैं। अमेरिकी, ब्रिटिश, स्पेनिश, ब्राजीलियाई, हंगेरियन, चीनी (PLA समर्थित), थाई और म्यांमार के निजी भाड़े के सैनिक (PMCs) भी अक्सर इस क्षेत्र में देखे गए हैं। अतीत में भी, 2007 में ब्रिटिश उच्चायुक्त पर हमला, म्यांमार के अराकान आर्मी का प्रभाव, बांग्लादेश में JMB, ISI, AQIS, AUMB जैसे आतंकी गुटों की गतिविधियां इसी नेटवर्क के हिस्से हैं।
ड्रग माफिया और आतंक का भूगोल
इस इलाके में ड्रग्स, हथियार, मानव तस्करी और आतंकवाद का नेटवर्क गहराई से जुड़ा है। अराकान आर्मी, जिसे अमेरिकी थिंक टैंक क्षेत्र का सबसे ताकतवर विद्रोही मानते हैं, चीन और अन्य देशों के सहयोग से म्यांमार-बांग्लादेश-भारत सीमा को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। यही नेटवर्क म्यांमार, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत में नक्सलियों, माओवादियों और अन्य उग्रवादी गुटों को लॉजिस्टिक और वित्तीय सहयोग देता है।
SCO और अमेरिकी भूमिका
SCO (शंघाई सहयोग संगठन) जैसे मंचों पर अमेरिका भले ही सीधे सदस्य न हो, पर वह क्षेत्रीय गतिविधियों, मानवाधिकार, ड्रग्स, और आतंकवाद के बहाने अपनी मौजूदगी और खुफिया नेटवर्क बढ़ा रहा है। बांग्लादेश में मिलिट्री एक्सरसाइज के बहाने अमेरिका स्थानीय सैन्य अधिकारियों, NGOs और सामाजिक संगठनों में पैठ बनाता है, जिससे भारतीय सुरक्षा ढांचे पर दबाव बन सके।
भारत के भीतर अशांति—CJP, NEET, और ‘URBAN NAXALS’
आज दिल्ली में CJP आंदोलन या NEET परीक्षा पर बवाल सिर्फ शिक्षा की खामियों की उपज नहीं है। इन आंदोलनों को जोड़ने के पीछे शहरी नक्सल, विदेशी NGO, और सोशल मीडिया प्रचार तंत्र का बड़ा हाथ है। CJP आंदोलन को संसद सत्र के दौरान तेज किया गया—जिसका मकसद संसद की कार्यवाही, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सरकार की साख को चोट पहुंचाना है।
इन प्रोटेस्ट्स की टाइमिंग, सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग के तरीके, विदेशी फंडिंग और अर्बन नक्सल नेटवर्क की संलिप्तता दर्शाती है कि यह सब योजनाबद्ध है। यदि आज NEET है, तो कल कोई और मुद्दा उठेगा; असल मकसद भारतीय सिस्टम में निरंतर अस्थिरता फैलाना है।
अंतरराष्ट्रीय सलाह और ‘ट्रेवल एडवाइजरी’
अक्सर देखा गया है कि जब-जब भारत में बड़े प्रदर्शन या अशांति होती है, अमेरिकी दूतावास और अन्य पश्चिमी देश अपने नागरिकों को ‘ट्रेवल एडवाइजरी’ जारी कर सतर्क करते हैं। यह केवल नागरिकों की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि दवाब बनाने और वैश्विक मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति है।
आगे की चुनौती: एकजुटता और सतर्कता
यह स्पष्ट है कि भारत के खिलाफ छद्म युद्ध लंबे समय तक चलने वाली रणनीति है। सीमाओं पर विदेशी हस्तक्षेप, भीतर अर्बन नक्सल और प्रोपेगेंडा नेटवर्क, ड्रग्स और आतंक का गठजोड़—सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। संसद हो, शिक्षा व्यवस्था या सामाजिक ताना-बाना—हर जगह इस नेटवर्क का असर दिखता है।
सरकार, सुरक्षा एजेंसियों और समाज को सतर्क रहते हुए, सूचना, सोशल मीडिया और नीतिगत मोर्चों पर एकजुटता दिखानी होगी। विदेशी हितों के नेटवर्क की पहचान, फंडिंग और लॉजिस्टिक्स पर नकेल, और जागरूकता अभियान—इन सबके जरिए ही भारत को अस्थिर करने की इस दीर्घकालिक साजिश का जवाब दिया जा सकता है।
निष्कर्ष:
यह लड़ाई केवल सीमा पर नहीं, हर उस जगह है जहां भारत का भविष्य और लोकतंत्र दांव पर है। यह जरूरी है कि देश की जनता, सरकार और संस्थाएं इन बहुस्तरीय चुनौतियों का सामना मिलकर करें और भारत की अखंडता व सुरक्षा को सर्वोपरि रखें।