- संस्कृतिक गौरव संस्थान द्वारा ‘किशोरों के सहमति संबंध: चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व कानूनी परिप्रेक्ष्य’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली के संविधान क्लब में किया गया।सेमिनार में न्याय, चिकित्सा, मनोविज्ञान, शिक्षा और कानून के प्रमुख विशेषज्ञ शामिल हुए।
- पैनल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस विनीत सरन, सीनियर एडवोकेट आलोक कुमार, डॉ. राजेंद्र के. धमीजा (निदेशक, IHBAS), साध्वी प्रज्ञा भारती (आध्यात्मिक नेता) और डॉ. सुरेंद्र जैन (शिक्षाविद्) उपस्थित रहे।
- अध्यक्षता श्री कपिल खन्ना (अध्यक्ष, संस्कृतिक गौरव संस्थान) ने की, संचालन डॉ. अनीमेश झा (प्रोफेसर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जबलपुर) ने किया।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 31 जुलाई : नई दिल्ली में संस्कृतिक गौरव संस्थान द्वारा ‘किशोरों के सहमति संबंध: चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व कानूनी परिप्रेक्ष्य’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें न्याय, चिकित्सा, मनोविज्ञान, शिक्षा और कानून के दिग्गज विशेषज्ञ एकत्र हुए और भारत में किशोर संबंधों की बढ़ती चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श किया।
- सर्वसम्मति से निर्णय: सहमति की आयु 18 वर्ष ही रहे; इसमें किसी भी प्रकार की कमी न हो।
- किशोरावस्था को भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक विकास की संवेदनशील अवस्था मानते हुए, विशेषज्ञों ने कानून की मौजूदा व्यवस्था को किशोरों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।
- समाधान कानून में बदलाव नहीं, बल्कि परिवार, मूल्यों पर आधारित शिक्षा, काउंसलिंग और कानून के प्रभावी पालन में है।
प्रमुख सिफारिशें:
- जस्टिस विनीत सरन: नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोच्च, 18 वर्ष की सहमति आयु में बदलाव न हो।
- आलोक कुमार: आयु में कोई भी ढील बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा; कानून का संतुलित और संवेदनशील क्रियान्वयन जरूरी।
- प्रो. डॉ. धमीजा: वैज्ञानिक शोध के अनुसार, किशोरों का मानसिक विकास 18 वर्ष तक पूर्ण नहीं; काउंसलिंग और परिवार मार्गदर्शन ज्यादा असरदार।
- साध्वी प्रज्ञा भारती: चरित्र, आत्मसंयम और पारिवारिक मूल्य भारतीय संस्कृति की नींव; नैतिक शिक्षा और संबंधों का सम्मान बच्चों के पालन-पोषण में फिर से जोड़ा जाए।
- डॉ. सुरेंद्र जैन: जिम्मेदार नागरिक निर्माण में स्कूलों की भूमिका अहम; शिक्षा में जीवन कौशल, नैतिकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता को शामिल किया जाए।
संयुक्त अनुशंसाएँ:
- 18 वर्ष की सहमति आयु बनी रहे।
- बाल संरक्षण कानूनों का निष्पक्ष और संवेदनशील क्रियान्वयन।
- भारतीय नैतिक मूल्यों और परिवार संस्था को पुनर्जीवित करना।
- विद्यालय और कॉलेज शिक्षा में मूल्य-आधारित शिक्षा को अनिवार्य करना।
- माता-पिता को किशोरों से संवाद बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना।
- किशोरों के लिए काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार।
- डिजिटल सुरक्षा और सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग पर नीति का फोकस।
- सार्वजनिक जागरूकता अभियानों के माध्यम से जिम्मेदार व्यवहार, संबंधों का सम्मान और नैतिक निर्णय-क्षमता को बढ़ावा।
निष्कर्ष:
संगोष्ठी में कहा गया कि कानून अकेले किशोरों से जुड़े सामाजिक मुद्दों का समाधान नहीं कर सकते। भारत को पारंपरिक परिवार व्यवस्था और नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित कर जिम्मेदार, अनुशासित और विश्वास आधारित समाज की ओर बढ़ना चाहिए।
अंतिम शब्द:
अध्यक्षीय भाषण में श्री कपिल खन्ना ने कहा—अधिकार और जिम्मेदारी में संतुलन भारतीय सभ्यता का मूल है। किशोरों की सुरक्षा परिवार, शिक्षा संस्थानों और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आयोजकों ने बताया कि अनुशंसाओं को संकलित कर संबंधित मंत्रालयों, सांसदों, विधि आयोग, बाल अधिकार संस्थाओं और अन्य हितधारकों को भेजा जाएगा।