- राज्यसभा में भाजपा सांसद राघव चड्ढा ने डॉक्टर-डायग्नोस्टिक सेंटर्स के बीच ‘रेफरल कमीशन’ और ‘कट मनी’ सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाई।
- आरोप: मरीजों का इलाज नहीं, सिर्फ रेफरल के बदले डॉक्टर की जेब में 3,000 रुपये तक कमीशन जाता है।
- डायग्नोस्टिक सेंटर इसे ‘मार्केटिंग खर्च’ तो डॉक्टर ‘रेफरल कमीशन’ बताकर रिकॉर्ड करते हैं; मरीज को 15-20% तक अधिक बिल चुकाना पड़ता है।
- मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमों में रेफरल कमीशन पर कड़ी मनाही—लाइसेंस सस्पेंड तक की सजा।
- चड्ढा ने कहा: समस्या डॉक्टरों के खिलाफ नहीं, बल्कि रेफरल सिस्टम के खिलाफ है; खासतौर से टियर-2 और टियर-3 शहरों में यह समस्या ज्यादा।
- मरीजों को चेतावनी: अगर डॉक्टर किसी एक सेंटर्स पर जोर दें या दूसरे सेंटर पर जांच कराने पर नाराज़ हों—समझें ये ‘रेड फ्लैग’ हैं।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 7 अगस्त :राज्यसभा में भाजपा सांसद राघव चड्ढा ने डॉक्टर-डायग्नोस्टिक सेंटर्स के बीच चल रही ‘रेफरल कमीशन’ और ‘कट मनी’ व्यवस्था का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ डॉक्टर मरीजों का इलाज करने के बजाय सिर्फ रेफरल के बदले 3,000 रुपये तक की कमीशन लेते हैं, जिससे मरीजों के मेडिकल बिल में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो जाती है। चड्ढा ने कहा—डायग्नोस्टिक सेंटर्स इसे मार्केटिंग खर्च के रूप में दिखाते हैं, जबकि डॉक्टर इसे रेफरल कमीशन। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और नेशनल मेडिकल कमीशन रेगुलेशन में इस पर कड़ी मनाही है—लाइसेंस तक सस्पेंड हो सकता है।
उन्होंने सरकार से अपील की कि इस ‘इनफॉर्मल इकोनॉमी’ पर सख्त कार्रवाई हो और मरीजों के हित में स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता लाई जाए।
मरीजों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई—अगर डॉक्टर किसी एक सेंटर पर बार-बार जोर दे या दूसरे सेंटर से जांच कराने पर असंतुष्ट हो, तो यह खतरे की घंटी है।