भारत में परिसीमन : सीमा बदलाव के बाद भाजपा होगी और शक्तिशाली ?

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पूनम शर्मा 

भारत में आने वाला परिसीमन (Delimitation) बदलावों का दौर लेकर आ सकता है। परिसीमन का मुख्य उद्देश्य हर निर्वाचन क्षेत्र में समान आबादी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, ताकि हर मतदाता की आवाज समान रूप से सुनी जाए। हालांकि, यह प्रक्रिया अब गहन राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुकी है। विपक्षी दलों का मानना है कि परिसीमन के माध्यम से भाजपा को और अधिक ताकतवर बनाया जा सकता है, जिससे भारत का सत्ता संतुलन बदल सकता है।

क्या है परिसीमन और क्यों है महत्वपूर्ण?

परिसीमन का अर्थ है—जनगणना के नवीनतम आँकड़ों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना। इसका मुख्य उद्देश्य है जनसंख्या के अनुपात में हर क्षेत्र का समान प्रतिनिधित्व। भारत में पिछली बार मुख्य परिसीमन 2002 में हुआ था, जो 2001 की जनगणना पर आधारित था। अगला परिसीमन 2026 की जनगणना के बाद अपेक्षित है।

राजनीतिक समीकरणों पर असर

भाजपा, जो वर्तमान में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है, को परिसीमन से सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है। इसकी वजह यह है कि भाजपा के मजबूत प्रदेशों—जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात—की आबादी तेज़ी से बढ़ी है, जबकि दक्षिण और पूर्वी राज्यों में (जहां क्षेत्रीय दलों और विपक्ष की पकड़ है) जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास सफल रहे हैं।

नए परिसीमन में जिन राज्यों की जनसंख्या अधिक है, उन्हें अधिक लोकसभा सीटें मिल सकती हैं, जबकि जिन राज्यों की जनसंख्या स्थिर या कम है, उनकी सीटें घट सकती हैं। इससे न केवल संसदीय समीकरण बदलेंगे, बल्कि भाजपा को उन क्षेत्रों में और अधिक सीटें मिल सकती हैं, जहां उसका आधार मजबूत है।

विपक्षी दलों की चिंता

समाजवादी पार्टी (सपा), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) समेत कई विपक्षी दलों ने खुलेआम अपनी चिंता जाहिर की है। मुख्य आशंका यही है कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में पिछले 30-40 वर्षों से मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यक उम्मीदवार लगातार जीतते आ रहे हैं, वहां परिसीमन के बाद उनका वर्चस्व टूट सकता है। कई क्षेत्रों की सीमाएं बदलने या मर्ज करने से अल्पसंख्यकों का वोट बैंक बंट सकता है और उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

विपक्षी दलों को यह भी डर है कि परिसीमन आयोग, जो केंद्र सरकार के अधीन है, सीमाएं कुछ इस तरह से निर्धारित कर सकता है कि विपक्ष के वोट बैंक विभाजित हो जाएं और भाजपा को सीधा लाभ मिले।

जनसांख्यिकीय संतुलन या राजनीतिक गणित?

जहां परिसीमन का घोषित उद्देश्य निष्पक्ष प्रतिनिधित्व है, वहीं आलोचकों का कहना है कि अक्सर इसका समय और कार्यान्वयन सत्ताधारी दल के राजनीतिक हितों को साधने के लिए किया जाता है। भाजपा की सांगठनिक क्षमता और उच्च जनसंख्या वाले राज्यों में लोकप्रियता उसे सीधा फायदा पहुंचा सकती है। इससे क्षेत्रीय पार्टियां और विपक्ष हाशिए पर जा सकते हैं, खासकर वे राज्य जो अब तक गैर-भाजपा प्रतिनिधि भेजते रहे हैं।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे भारतीय संघीय ढांचे पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को अपनाया, उन्हें “सजा” के रूप में सीटें कम मिलेंगी, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा शक्ति मिलेगी।

अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव

परिसीमन के सबसे अहम पहलुओं में से एक है—अल्पसंख्यकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर इसका असर। जिन सीटों पर दशकों से अल्पसंख्यक जीतते रहे हैं, वे नई सीमाओं में मिलाकर बड़े और मिश्रित क्षेत्रों में तब्दील हो सकती हैं, जिससे ऐसे उम्मीदवारों की जीत मुश्किल हो जाएगी इस बात से विपक्ष को प्रेसगनी हो सकती है ।

भारतीय लोकतंत्र की अग्नि परीक्षा

आगामी परिसीमन केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा है। परिसीमन लोकतंत्र की सेहत के लिए जरूरी है, लेकिन इसे निष्पक्षता और पारदर्शिता से लागू किया जाना चाहिए। विपक्ष की आशंकाएँ वास्तविक हैं, क्योंकि सीटों के बदलने से राजनीतिक शक्ति संतुलन बदल सकता है। भाजपा को इन बदलावों से बड़ा फायदा मिल सकता है, इससे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की बड़ी जिम्मेदारी भी सामने है।

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