सुबोध मिश्रा
‘प्लूरलिज्म’ की कसौटी पर न्यूयॉर्क के मेयर
न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के 29 अगस्त के प्रस्तावित कार्यक्रम का विरोध केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है। यह एक बड़ा सवाल उठाता है—क्या अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता और बहुलतावाद के सिद्धांत हिंदुओं पर भी उसी तरह लागू होते हैं, जैसे अन्य समुदायों पर?
ममदानी ने कहा है कि वह इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें नहीं मालूम कि न्यूयॉर्क शहर के पास किसी निजी कार्यक्रम को रद्द कराने का कानूनी अधिकार है या नहीं।
यही लोकतंत्र की मूल कसौटी है। किसी मेयर को किसी संगठन की विचारधारा की आलोचना करने और उसके नेताओं से राजनीतिक असहमति रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी शांतिपूर्ण निजी कार्यक्रम का केवल उसके वक्ता की वैचारिक पहचान के कारण विरोध करना बहुलतावाद की निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
यह कार्यक्रम American Hindus for Engagement and Dialogue (AHEAD Forum) द्वारा आयोजित किया जा रहा है, जिसमें 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों के शामिल होने की बात कही गई है। आयोजकों के अनुसार इसका उद्देश्य साझा विरासत, अंतरधार्मिक संवाद और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय भावना को सामने रखना है।
क्या धर्मनिरपेक्षता चयनात्मक हो सकती है?
ममदानी की राजनीति में प्रगतिशीलता, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक भेदभाव का विरोध प्रमुख मुद्दे रहे हैं। इजरायल और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर भी उनका रुख अत्यंत मुखर रहा है। चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने नेतन्याहू की गिरफ्तारी की बात कही थी, हालांकि बाद में स्वीकार किया कि न्यूयॉर्क शहर के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है।
गाजा और इजरायल पर उनके विचारों से सहमत या असहमत होना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वही कसौटी हर धर्म और हर विचारधारा पर समान रूप से लागू होती है?
यदि किसी संगठन की विचारधारा पर आपत्ति है, तो उसकी खुलकर आलोचना कीजिए। उसके विचारों का तथ्यात्मक प्रतिवाद कीजिए। लेकिन लोकतंत्र का रास्ता प्रतिबंध नहीं, बल्कि बहस और सार्वजनिक विमर्श है। यही सिद्धांत हिंदुओं पर भी लागू होना चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता की कसौटी सबके लिए समान हो
USCIRF के उपाध्यक्ष आसिफ महमूद ने , जो पाकिस्तान में जन्मे हैं, भी डॉ. भागवत की यात्रा और RSS से जुड़े संगठनों पर आरोपों को लेकर आलोचना की है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाना उनका अधिकार है। लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की विश्वसनीय वकालत तभी प्रभावी होगी, जब वही मानदंड पाकिस्तान जैसे देशों पर भी समान रूप से लागू हों, जहाँ हिंदुओं, ईसाइयों, शियाओं, अहमदियों और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव तथा बलूचिस्तान, पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर और खैबर पख्तूनख्वा में दमन के आरोप लगातार उठते रहे हैं।
फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि पाकिस्तानी नेताओं या सैन्य अधिकारियों को अमेरिका आने से रोका जाना चाहिए। उन्हें अमेरिकी कानूनों के तहत आने, बातचीत करने और अपनी बात रखने का अधिकार है। यही लोकतांत्रिक तरीका RSS और डॉ. भागवत के मामले में भी होना चाहिए।
आरोपों की जांच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। किसी भी अमेरिकी धार्मिक-स्वतंत्रता संस्था की विश्वसनीयता की असली कसौटी यही है कि वह सभी धर्मों और विचारधाराओं पर समान मानदंड लागू करे।
धार्मिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह किसी एक समुदाय के लिए विशेषाधिकार और दूसरे के लिए संदेह का पर्याय न बन जाए।
भारत को भी एक ही रंग में न रंगें
ममदानी की भारतीय विरासत उनकी सार्वजनिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन भारत पर चर्चा करते समय तस्वीर अक्सर राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलती दिखाई देती है—कभी भारत को बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बताया जाता है, तो कभी RSS को उसी व्यवस्था के विपरीत खड़ा कर दिया जाता है।
भारत को सुविधा के अनुसार कभी धर्मनिरपेक्ष और कभी सांप्रदायिक बताना उचित नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं लंबे समय तक RSS के स्वयंसेवक रहे हैं। उनकी सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाएँ—गरीबों के लिए खाद्य सहायता, आवास, उज्ज्वला गैस कनेक्शन, स्वच्छता और विद्युतीकरण—सभी नागरिकों के लिए बनाई गई हैं। इनकी सफलता या विफलता पर राजनीतिक बहस हो सकती है, लेकिन हर नीति को केवल सांप्रदायिक चश्मे से देखना तर्कसंगत नहीं होगा।
भागवत को बोलने दीजिए, फैसला जनता पर छोड़िए
इस विवाद का लोकतांत्रिक समाधान सरल है—डॉ. भागवत को बोलने दीजिए।
यदि उनके विचार आपत्तिजनक लगते हैं, तो उनकी सार्वजनिक आलोचना कीजिए। यदि RSS की किसी नीति से असहमति है, तो उसके तथ्य सामने रखिए। और यदि कार्यक्रम वास्तव में सामाजिक समरसता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देता है, जैसा आयोजकों का कहना है, तो अमेरिकी नागरिकों को उसे सुनकर स्वयं निर्णय लेने दीजिए।
RSS ने भी आलोचकों और इच्छुक लोगों को कार्यक्रम में आकर संगठन की विचारधारा समझने का निमंत्रण दिया है।
यही मुक्त समाज का रास्ता है।
धर्मनिरपेक्षता की असली परीक्षा उन विचारों की स्वतंत्रता की रक्षा करना नहीं है, जिन्हें हम पसंद करते हैं। असली परीक्षा तब होती है, जब हमें उन विचारों और लोगों के अधिकारों की रक्षा करनी पड़े, जिनसे हम असहमत हैं।
न्यूयॉर्क विविधता पर खड़ा शहर है। इसलिए उसके मेयर की जिम्मेदारी और भी बड़ी है कि उसका बहुलतावाद चयनात्मक न बन जाए।
यदि मुसलमानों को धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने, यहूदियों को धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन करने, ईसाइयों को अपने विश्वास का पालन करने और राजनीतिक संगठनों को अपनी विचारधारा रखने की स्वतंत्रता है, तो हिंदुओं को भी बिल्कुल वही अधिकार मिलना चाहिए।
इससे कम कुछ भी वास्तविक धर्मनिरपेक्षता नहीं कहलाएगा।
वरना वह धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के मुखौटे में एक नई धार्मिक पक्षधरता होगी।