भारत महाशक्ति नहीं, मानवता की सेवा से बना ‘विश्वगुरु’: मोहन भागवत

कनाडा के टोरंटो में 'हिंदू विश्व बंधु' सम्मेलन को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत ने कभी किसी देश को नहीं जीता, बल्कि दुनिया को ज्ञान और मूल्य दिए।

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  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु’ सम्मेलन को संबोधित किया।
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ‘महाशक्ति’ (Superpower) बनने के बजाय मानवता की सेवा के जरिए ‘विश्वगुरु’ बना है।
  • भागवत ने जोर देकर कहा कि “अगर हिंदू जागते हैं, तो दुनिया जागती है”, क्योंकि भारत के डीएनए में सार्वभौमिक मित्रता और विविधता का सम्मान शामिल है।

टोरंटो (कनाडा),1 सितंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में एक विशाल और भव्य प्रवासी सम्मेलन ‘हिंदू विश्व बंधु – एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित किया। कनेडियन हिंदुओं फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग (CHORD) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में कमान संभालने वाले पूर्व रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी सहित 2,500 से अधिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे। अपने बहुचर्चित संबोधन में मोहन भागवत ने भारतीय सभ्यता के मूल चरित्र, वैश्विक भाईचारे और वसुधैव कुटुंबकम की भावना पर विस्तार से प्रकाश डाला।

विस्तारवाद नहीं, बल्कि ज्ञान और शरण देने की रही परंपरा

अपने संबोधन के दौरान आरएसएस प्रमुख ने ऐतिहासिक और आधुनिक उदाहरणों का हवाला देते हुए बताया कि भारत का इतिहास कभी भी भौगोलिक विजय या साम्राज्यवाद का नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने बिना किसी देश को जीते, मैक्सिको से लेकर साइबेरिया तक की यात्राएं कीं और दुनिया को विज्ञान, आयुर्वेद, खगोल शास्त्र तथा उच्च मानवीय मूल्यों का ज्ञान बांटा। दुनिया के किसी भी कोने में जब भी मानवीय संकट उत्पन्न हुआ या लोगों पर अत्याचार हुआ, तब भारत ने हमेशा उन्हें खुले दिल से शरण दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पोलिश शरणार्थियों को जामनगर के महाराजा द्वारा आश्रय दिए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि संकट के समय भारत ने हमेशा बिना मांगे मदद का हाथ बढ़ाया है।

विविधता ही भारत की असली ताकत और पहचान

भारत की सांस्कृतिक विशिष्टता को रेखांकित करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि विविधता कोई समस्या नहीं है, बल्कि यह उस साझी एकता की सबसे खूबसूरत सजावट है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘हिंदू’ शब्द किसी एक भाषा, पूजा-पद्धति या रहन-सहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सबको साथ लेकर चलने वाली जीवनशैली है। विविधता को प्रकृति का नियम बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन हमेशा से जड़ और चेतन दोनों में एक ही दिव्यता को देखता आया है। यही कारण है कि भारत की धरती पर पारसी, यहूदी, मुस्लिम और ईसाई सभी ने बिना किसी भय के अपनी मान्यताओं के साथ जीवन बिताया और तरक्की की।

‘अगर हिंदू जागते हैं, तो दुनिया जागती है’

अपने भाषण के समापन पर एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत के उत्थान का पैमाना केवल सैन्य या आर्थिक ताकत नहीं होना चाहिए, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह दुनिया के कल्याण और एक एकजुट मानवता के लिए कितना योगदान देता है। उन्होंने कहा कि जब समाज के भीतर छिपी मानवीय करुणा, कर्तव्यबोध और सांस्कृतिक मूल्य जागृत होते हैं, तो संपूर्ण विश्व में सकारात्मक बदलाव आता है। इसी संदर्भ में उन्होंने बल देते हुए कहा कि “अगर हिंदू जागते हैं, तो दुनिया जागती है”, क्योंकि भारत का डीएनए ही संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की प्रेरणा देता है।

 

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