पूनम शर्मा
नेपाल और चीन के पर्वतीय इलाके भयंकर बाढ़ के बाद गहरे शोक में डूबे हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने न केवल सैकड़ों गांव और बुनियादी ढांचे को नष्ट किया, बल्कि 1,000 से अधिक विदेशी नागरिकों की जान भी ले ली। रसुवा सहित अन्य प्रभावित जिलों में नेपाली अधिकारी लगातार मृतकों के शवों की खोज और रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहे हैं।
नेपाल के पर्यटन विभाग के अनुसार, 38 देशों के कुल 583 विदेशी नागरिक—जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और भारत शामिल हैं—अब भी लापता हैं। यह आपदा न सिर्फ स्थानीय, बल्कि वैश्विक स्तर पर असर डालने वाली है।
चीनी अधिकारियों के अनुसार, उनके क्षेत्र में 23 देशों के कम से कम 461 विदेशी नागरिकों का अब तक कोई सुराग नहीं है। इनमें से अधिकांश लोग ट्रेकिंग, पर्वतारोहण या ईको-टूरिज्म में लगे थे।
संस्कार और पहचान की उम्मीद
रेस्क्यू टीम लगातार कठिन इलाकों और मौसम में सैकड़ों शव बरामद कर रही है। सभी शवों को डीएनए सैंपल के साथ सुरक्षित रखा जा रहा है, और एयरटाइट पैकिंग तथा सटीक पहचान प्रक्रिया अपनाई जा रही है। शवों को दफनाया गया है ताकि भविष्य में किसी भी पहचान के बाद परिजनों को सौंपा जा सके।
सामूहिक दफन: करुणा और मानवता
तेजी से बढ़ती मौतों और सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए, नेपाल और चीन दोनों ने अज्ञात शवों के सामूहिक दफन शुरू कर दिए हैं। लेकिन यह प्रक्रिया अनाम नहीं है—हर शव के साथ उसकी पहचान संबंधी फाइल और डीएनए रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया है। अधिकारियों का कहना है कि अगर महीनों या वर्षों बाद भी कोई परिवार अपने प्रियजन की पहचान करता है, तो उसे शव सौंपा जा सकेगा ताकि अंतिम संस्कार उसकी परंपरा के अनुसार हो सके।
इस त्रासदी ने दिखाया कि वैश्विक यात्रा के युग में दुख की कोई सीमा नहीं होती। सोशल मीडिया पर दुनियाभर के परिवार अपने प्रियजनों की तस्वीरें और जानकारी साझा कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय दूतावास, एनजीओ और विशेषज्ञ मदद के लिए पहुंचे हैं।
स्थानीय समुदाय, जिनके अपने घर और लोग भी खो गए, अब न केवल अपने लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लोगों के लिए भी मदद और शोक में साथ हैं।
निराशा में भी आशा
रेस्क्यू ऑपरेशन में कभी-कभी चमत्कारी बचाव की खबरें भी आ रही हैं, लेकिन अधिकांश परिवारों के लिए सुकून डीएनए पहचान या सामूहिक दफन प्रक्रिया से ही मिलेगा।
यह त्रासदी केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता और करुणा की कहानी है। रसुवा की पहाड़ियाँ और इनकी वादियाँ आने वाले वर्षों तक इस दर्द और संवेदनशीलता को संजोए रखेंगी।