जस्टिस अश्वनी शर्मा की नियुक्ति पर अनावश्यक विवाद

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने पंजाब सरकार के रुख को नकारा, कहा—संविधान और 'मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीजर' के तहत हुई है पूरी प्रक्रिया।

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  • पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में जस्टिस अश्वनी शर्मा की नियुक्ति पर पंजाब सरकार द्वारा खड़ा किया गया विवाद पूरी तरह अनावश्यक है।
  • भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने स्पष्ट किया है कि यह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत राष्ट्रपति द्वारा पूरी तरह तय कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है।
  • हरियाणा सरकार और दोनों राज्यों के गवर्नरों ने समय पर अपनी सहमति दे दी थी, जबकि पंजाब सरकार ने निर्धारित समय में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

समग्र समाचार सेवा
चंडीगढ़, 7 सितंबर: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के पद पर जस्टिस अश्वनी शर्मा की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार द्वारा उठाए गए हालिया सवालों और राजनीतिक बयानबाजी पर कानूनी हलकों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) सत्य पाल जैन ने चंडीगढ़ में एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए पंजाब सरकार के इस रवैये को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और पूरी तरह से अनावश्यक करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था से जुड़े मामलों में बिना किसी ठोस कानूनी आधार के विवाद पैदा करना उचित नहीं है। यह नियुक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद यानी भारत के राष्ट्रपति द्वारा पूरी तरह पारदर्शी और स्थापित कानूनी प्रावधानों के तहत की गई है।

तय प्रक्रिया और ‘MOP’ का रखा गया है पूरा ध्यान

कानूनी विशेषज्ञों और ASG सत्य पाल जैन के अनुसार, भारत में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक बेहद सख्त और पूर्व-निर्धारित प्रक्रिया है, जिसे ‘मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीजर’ (MOP) कहा जाता है। जस्टिस अश्वनी शर्मा की नियुक्ति से पहले इस पूरी प्रक्रिया का अक्षरशः पालन किया गया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 6 अगस्त 2026 को देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों—जिनमें महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब और हरियाणा शामिल हैं—के चीफ जस्टिस की नियुक्ति के लिए नामों की पहली सूची की सिफारिश की थी। इन सभी प्रस्तावों को संबंधित राज्यों के पास उनकी राय और टिप्पणियों के लिए भेजा गया था, जिसमें किसी भी मौजूदा नियम का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

पंजाब सरकार की टालमटोल और कानूनी स्थिति

प्रक्रिया के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा दोनों राज्य सरकारों को इस नियुक्ति प्रस्ताव के संबंध में 10 अगस्त 2026 को आधिकारिक रूप से अवगत कराया गया था और उनकी राय मांगी गई थी। हरियाणा सरकार तथा दोनों राज्यों के राज्यपालों ने निर्धारित समय सीमा यानी 12 और 13 अगस्त तक अपनी सकारात्मक सहमति और राय भेज दी थी, जिसके आधार पर आगे की प्रक्रिया पूरी की गई। हालांकि, पंजाब सरकार ने तय समय सीमा (एक से दो सप्ताह) बीत जाने के बाद भी अपनी कोई राय नहीं भेजी और अब इस पर अनावश्यक सवाल खड़े कर रही है। कानूनविदों का कहना है कि राज्य सरकारों की राय केवल परामर्श के लिए होती है और यह केंद्र सरकार या कॉलेजियम के लिए बाध्यकारी नहीं होती है, यानी राज्यों के पास इस प्रक्रिया में कोई ‘वीटो’ पावर नहीं होती है।

न्यायिक प्रक्रिया का राजनीतिकरण अनुचित

सत्य पाल जैन ने अपने बयान में इस बात पर भी जोर दिया कि किसी भी गैर-राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए अनिश्चित काल तक लटकाए रखने या बाधित करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। संविधान प्रदत्त व्यवस्था के तहत देश की न्यायपालिका को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय पर नियुक्तियां होना अनिवार्य है। पंजाब सरकार द्वारा इस मामले में सहयोग न करने और अनावश्यक बयानबाजी करने से प्रशासनिक कार्यों में बाधा उत्पन्न होती है। इस स्पष्टीकरण के बाद अब यह साफ हो गया है कि जस्टिस अश्वनी शर्मा की नियुक्ति पूरी तरह से संवैधानिक और वैध है, तथा इस पर किसी भी प्रकार का विवाद कानूनी दायरे में टिकने वाला नहीं है।

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