पूनम शर्मा
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने भारतीय राजनीति के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न फिर खड़ा कर दिया है—क्या किसी चुनाव प्रणाली पर भरोसा इस आधार पर तय होना चाहिए कि कौन-सी पार्टी जीती और कौन हारी?
23 अक्टूबर को कर्नाटक की चार शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए हुए विधान परिषद चुनाव में भाजपा-जद(S) गठबंधन ने चारों सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा ने तीन सीटें जीतीं, जबकि जद(S) ने बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस से छीन लिया। कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। बेंगलुरु शिक्षक सीट पर जद(S) के ए.पी. रंगनाथ ने कांग्रेस के पुट्टन्ना को 908 मतों से हराया। यह चुनाव बैलेट पेपर और वरीयता आधारित मतदान प्रणाली से हुआ था।
यह नतीजा इसलिए भी चर्चा का विषय बना है क्योंकि कांग्रेस पिछले कुछ समय से “वोट चोरी”, EVM और मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठा रही है। सितंबर 2026 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी ने भी EVM और मतदाता सूची से जुड़ी कथित “मैच फिक्सिंग” का आरोप लगाया था।
ऐसे में कर्नाटक का परिणाम एक स्वाभाविक प्रश्न उठाता है—यदि बैलेट पेपर से हुए चुनाव में भी कांग्रेस को स्पष्ट हार मिलती है, तो क्या हर चुनावी पराजय का कारण EVM को माना जा सकता है?
EVM की शुरुआत भाजपा के दौर में नहीं हुई
इस बहस में इतिहास को याद करना जरूरी है। भारत में EVM का पहली बार प्रयोग 1982 में केरल की परूर विधानसभा सीट पर किया गया था। उस चुनाव में 50 मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल हुआ। यह वह दौर था जब आज की राजनीतिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं और भाजपा राष्ट्रीय सत्ता की प्रमुख पार्टी नहीं थी।
इसके बाद EVM की व्यवस्था कानूनी, तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से विकसित हुई। 1989 से इसके इस्तेमाल का वैधानिक आधार बना और धीरे-धीरे इसे पूरे देश में लागू किया गया। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी 543 संसदीय सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ।
इस इतिहास से इतना स्पष्ट है कि EVM किसी एक वर्तमान सरकार या राजनीतिक दल की बनाई हुई व्यवस्था नहीं है।
इन्हीं EVM से अलग-अलग दल जीतते रहे हैं
चुनावी इतिहास भी एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखता है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल सहित लगभग पूरे देश में वर्षों से EVM आधारित चुनाव होते रहे हैं और इनके परिणाम अलग-अलग राजनीतिक दलों के पक्ष में जाते रहे हैं।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भी EVM से हुए अनेक चुनाव जीत चुके हैं। कई राज्यों में भाजपा विरोधी दलों ने इन्हीं मशीनों से चुनाव जीतकर सरकार बनाई है।
इसका अर्थ यह नहीं कि चुनाव व्यवस्था पर सवाल नहीं उठने चाहिए। लोकतंत्र में प्रत्येक संस्था की जांच और आलोचना संभव होनी चाहिए। लेकिन सवाल सबूतों पर आधारित और राजनीतिक रूप से सुसंगत होने चाहिए।
जीतने पर वही व्यवस्था निष्पक्ष और हारने पर संदिग्ध—यह लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
बैलेट पेपर से EVM तक क्यों पहुंचा भारत?
पुरानी बैलेट व्यवस्था सरल दिखाई दे सकती है, लेकिन भारतीय चुनावों का इतिहास अवैध मतों, मतपेटियों पर कब्जे, बैलेट स्टफिंग और लंबी तथा विवादास्पद मतगणना जैसी समस्याओं से भी जुड़ा रहा है। इन्हीं चुनौतियों को कम करने के लिए EVM व्यवस्था विकसित हुई।
आज EVM के साथ VVPAT भी जुड़ा है, जिसके माध्यम से मतदाता कुछ सेकंड तक पर्ची देखकर यह सत्यापित कर सकता है कि उसका वोट उसी उम्मीदवार के नाम दर्ज हुआ जिसे उसने चुना है।
निर्वाचन आयोग के अनुसार मौजूदा भारतीय EVM इंटरनेट, Wi-Fi या Bluetooth से जुड़ी हुई मशीनें नहीं हैं। मतदान से पहले मॉक पोल और मशीनों की रैंडमाइजेशन प्रक्रिया होती है। उम्मीदवारों और उनके प्रतिनिधियों की मौजूदगी में कई प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।
मतदान के बाद मशीनों को मजबूत कमरों में रखा जाता है, जहां डबल लॉक, सशस्त्र सुरक्षा और 24 घंटे CCTV निगरानी की व्यवस्था होती है। उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को भी निगरानी की अनुमति रहती है।
निर्वाचन आयोग के अनुसार अब तक 67,750 से अधिक चयनित VVPAT मशीनों के 4.5 करोड़ से ज्यादा मतों का मिलान किया गया है और ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया जिसमें उम्मीदवार A को दिया गया मत उम्मीदवार B को स्थानांतरित पाया गया हो।
अप्रैल 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूर्ण रूप से बैलेट पेपर व्यवस्था में लौटने तथा प्रत्येक VVPAT पर्ची की अनिवार्य गणना की मांग स्वीकार नहीं की थी। हालांकि न्यायालय ने चुनावी भरोसा मजबूत करने के लिए कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी सुझाए।
कर्नाटक का संदेश क्या है?
कर्नाटक विधान परिषद का चुनाव लोकसभा या विधानसभा चुनाव से अलग है। इसमें शिक्षक और स्नातक विशेष मतदाता होते हैं और वरीयता के आधार पर बैलेट पेपर से मतदान होता है। फिर भी कांग्रेस चारों सीटें हार गई। इससे एक बात जरूर स्पष्ट होती है—बैलेट पेपर किसी राजनीतिक दल की जीत की गारंटी नहीं है।
कभी-कभी मतदाता वास्तव में किसी पार्टी को अस्वीकार करता है। और वहीं से राजनीतिक दलों के लिए असली आत्ममंथन शुरू होना चाहिए।
क्या संगठन कमजोर था? क्या उम्मीदवार मतदाताओं को स्वीकार्य नहीं था? क्या गठबंधन ने बेहतर वोट ट्रांसफर किया? क्या पार्टी अपने संदेश को मतदाताओं तक पहुंचाने में असफल रही?
बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जद(S) उम्मीदवार ने पांच बार जीत चुके कांग्रेस प्रत्याशी को हराया। इसे समझने के लिए राजनीतिक कारणों की पड़ताल अधिक उपयोगी होगी, बजाय हर परिणाम को चुनाव तकनीक से जोड़ने के।
सत्ता पाने का रास्ता केवल चुनाव से जाता है
संवैधानिक लोकतंत्र में सत्ता प्राप्त करने का केवल एक वैध रास्ता है—मतदाताओं का विश्वास जीतना और चुनाव जीतना। जो पार्टी हारती है, उसे अपना संगठन मजबूत करना चाहिए, बेहतर उम्मीदवार देने चाहिए, लोगों से संवाद बढ़ाना चाहिए और राजनीतिक विश्वास पुनः अर्जित करना चाहिए।
हर हार के बाद मशीन, निर्वाचन आयोग या पूरी चुनाव प्रणाली पर अविश्वास जताना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परंपरा नहीं बन सकती। और यह नियम केवल कांग्रेस पर नहीं, बल्कि भाजपा और हर क्षेत्रीय पार्टी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। विदेशी हस्तक्षेप या विदेशी फंडिंग जैसे विषय गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दे हैं, विदेशी वित्तपोषित समूह द्वारा भारत को अस्थिर कर “कठपुतली सरकार” स्थापित करने जैसी बातों को इन विरोधों के पीछे माना जा सकता।
लोकतंत्र की रक्षा करते समय हमें प्रमाण और आशंका के बीच अंतर बनाए रखना होगा।
लोकतंत्र राजनीतिक सुविधा से नहीं, प्रमाण से चलता है
आज भारत में चुनाव पहले की तुलना में कहीं अधिक निगरानी के बीच होते हैं। मतदान एजेंट, VVPAT, वीडियोग्राफी, CCTV, स्ट्रॉन्ग रूम, सुरक्षा बल, न्यायिक समीक्षा और मीडिया की तत्काल निगरानी—ये सब चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की अतिरिक्त परतें जोड़ते हैं।
इन व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाया जाना चाहिए। वास्तविक शिकायतों का जवाब निर्वाचन आयोग को पारदर्शी ढंग से देना चाहिए और प्रमाण मिलने पर राजनीतिक दलों को न्यायालय जाने का पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन केवल इसलिए बैलेट पेपर पर लौटने की मांग करना कि EVM से मिला कोई परिणाम राजनीतिक रूप से अनुकूल नहीं है, पर्याप्त तर्क नहीं है।
कर्नाटक के नतीजे इस बहस को एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण संदेश देते हैं— बैलेट पेपर आपको हरा सकता है और EVM आपको जिता सकती है।
भारत का शासक न बैलेट पेपर तय करता है, न मशीन।
अंतिम निर्णय मतदाता का होता है।