महाराष्ट्र ने देश को संवैधानिक जागरूकता की राह दिखाई- पूर्व आईएएस अधिकारी ई ज़ेड खोबरागड़े

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 7 अगस्त। महाराष्ट्र ने संवैधानिक जागरूकता की शुरुआत कर देश को राह दिखाने का काम किया. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान की पूरी जानकारी होनी चाहिए. इसके लिए उन्हें संविधान का पठन करना होगा और उसे समझ कर उस राह पर चलना होगा, यह प्रतिपादन पूर्व आईएएस अधिकारी ई ज़ेड खोबरागड़े ने किया.

 महाराष्ट्र सूचना केंद्र की ओर से आयोजित महाराष्ट्र हीरक महोत्सव व्याख्यान श्रृंखला में ‘संविधान और जागरूकता’ विषय पर ५१ वे व्याख्यान में श्री खोबरागड़े बोल रहे थे. उन्होंने आगे कहा कि भारतीय संविधान सभा ने डा बाबासाहब अंबेडकर को भारतीय संविधान के शिल्पकार कहकर गौरवान्वित किया और यह महाराष्ट्र के लिए गर्व की बात है. उन्होंने कहा कि देश में संविधान लागू होने के उपरांत कई भारतीयों को इसके बारे में आवश्यक जानकारी भी नहीं थी. ऐसी स्थिति में संविधान क्या होता है इसकी जानकारी जनता तक पहुंचाने के उद्देश्य से महाराष्ट्र ने संविधान जागरूकता की शुरुआत की. राज्य में वर्ष 2008 से 26 नवंबर का दिन संविधान दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. यह काम काफी बड़ा था क्योंकि इसके माध्यम से महाराष्ट्र ने देश को राह दिखाने का उल्लेखनीय काम किया है.

 

26 नवम्बर संविधान दिवस – 

श्री खोबरागड़े ने आगे कहा कि संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को भारतीयों को संविधान अर्पित किया. 26 नवंबर को संविधान दिवस के रुप में मनाया जाता और आगे चलकर 26 जनवरी 1950 को संविधान देश में लागू किया गया और इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में देश भर में मनाया जाने लगा. उन्होंने आगे कहा कि 26 नवंबर संविधान दिवस के रूप में राज्य भर में मनाने का प्रस्ताव सामाजिक न्याय विभाग की ओर से महाराष्ट्र सरकार को दिया गया. इसके पश्चात 24 नवंबर 2008 को राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने इस संदर्भ में सरकारी आदेश जारी कर वर्ष 2008 से 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का आदेश दिया.

 

शालेय पुस्तकों मे संविधान की प्रस्तावना-  

उन्होंने कहा कि वर्ष २००६-०७ में महाराष्ट्र में शालेय पुस्तकों में भारतीय संविधान की प्रस्तावना प्रकाशित की गई. यह उपक्रम लागू करने वाला महाराष्ट्र देश का पहला राज्य बना. 4 फरवरी 2013 को राज्य में शालेय शिक्षण विभाग ने आदेश जारी कर राज्य की सभी पाठशालाओं में संविधान के प्रस्तावना को पठन और संविधान जागरूकता के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं के आयोजन के निर्देश दिए. पाठशाला और महाविद्यालयों में संविधान का पठन करने तथा उसकी मूलभूत चर्चा कराने के लिए राज्य सरकार ने कार्यक्रम आयोजित किए. इन उपक्रमों के माध्यम से महाराष्ट्र ने देश को राह दिखाई.

 

संविधान जागरूकता राष्ट्र निर्माण का हिस्सा

 

वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने भी 26 नवंबर का दिन संविधान दिन के रूप में मनाने का निर्णय लिया और देश के सभी पाठशाला ए महाविद्यालय और सरकारी कार्यालयों में यह दिन मनाया जाने लगा. संविधान देश के निर्माण और लोगों को जोड़ने का काम करता है इसलिए इस विषय पर जनजागृति करना अनिवार्य है. संविधान जागरूकता का काम राष्ट्र निर्माण का ही हिस्सा है और इसका पहला प्रयोग वर्ष 2005 में नागपुर जिले के पाठशालाओ से शुरू हुआ.

 

संविधान प्रस्तावना के पठन का काम-  

श्री खोबरागड़े ने बताया कि वह नागपुर जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे, उस समय शालेय छात्रों में संविधान के मूल्यों के संस्कार को बोने के लिए उन्होंने नागपुर जिला के सभी पाठशालाओं में संविधान प्रस्तावना के पठन का काम करवाया. उन्होंने कहा कि पाठशालाओं की दीवारों पर संविधान की प्रस्तावना लिखी गई तथा प्रार्थना के स्थान पर भी इसकी प्रस्तावना को पढ़ा जाता और संविधान दिवस भी सभी जगह पर मनाया जाता. उन्होंने कहा कि इसके बाद वे जब वर्धा में जिलाधीश के रूप में कार्यरत थे, तब उन्होंने यही उपक्रम वहां पर भी चलाया. वर्ष 2008 में सामाजिक न्याय विभाग में आयुक्त के रूप में काम करते समय उन्होंने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाए जाने के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

 

प्रस्तावना में संविधान का सारांश-  

उन्होंने बताया कि संविधान की प्रस्तावना में उसका पूरा सारांश शामिल है और साथ ही लक्ष्य और उद्देश्य भी दर्ज है. श्री खोब्रागडे ने कहा कि 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई जिसके पश्चात 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान के लक्ष्य और उद्देश्य का प्रस्ताव संविधान सभा में रखा. इस प्रस्ताव में कुछ दुरुस्ती करके तथा ज्ञान चर्चा के पश्चात प्रस्तावना के रूप में मान्यता दे दी गई.

 

देश को मजबूत करने में संविधान महत्वपूर्ण-  

उन्होंने आगे कहा कि भारत के स्वाधीनता के पश्चात संवैधानिक मूल्यों के आधार पर सार्वभौम, धर्मनिरपेक्ष, प्रजातंत्र देश निर्माण करने के लिए और साथ ही देश के नागरिकों के अधिकार का संरक्षण करने उनको सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देने का विचार प्रस्तावना में शामिल है. उन्होंने कहा कि जाति, भाषा, प्रदेश, लिंग जैसा कोई भी भेदभाव ना करते हुए इस प्रस्तावना ने उन्हें न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुता जैसे मूलतत्व प्रदान किए और देश को एकजुट और मजबूत करने का काम किया.
श्री खोब्रागडे ने यह भी कहा कि संविधान हमारा राष्ट्रीय ग्रंथ है और वह सभी के लिए है. इस कारण उसके बारे में जानकारी रखना सभी देश के नागरिकों के लिए आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे और न्याय के साथ ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा संविधान के मूलभूत तत्वों में शामिल है.

 

मूलभूत अधिकार, मूलभूत कर्तव्य, मार्गदर्शक तत्वे

 

मूलभूत अधिकार, मूलभूत कर्तव्य, मार्गदर्शक तत्वे, संविधान का कार्यान्वयन करने वाली विधायिका, कार्यकारी मंडल और न्यायपालिका की जानकारी भी संविधान में विस्तार से दी गई है. लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करना उन्हें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और सभी प्रकार के अवसर मुहैय्या कराने के साथ ही उनके सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी संविधान कार्यान्वित किया गया है. उन्होंने आगे कहा कि देश के हर नागरिक के मूलभूत अधिकार का संरक्षण करने के लिए सभी को अपने मूल कर्तव्य का पालन करना चाहिए. इसके लिए सभी को संविधान की जानकारी होना आवश्यक है. उन्होंने अंत में यह भी कहा कि सभी को संविधान पढ़ना ही चाहिए, उसे समझना चाहिए और उसका अनुकरण करना चाहिए जिससे देश को और सशक्त बनाया जा सके.

 

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