एक सिनेमैटिक हिंदी इमेज
विजय पाल सिंह
हम अक्सर एक ही जगह होते हैं, एक ही विषय पर बात कर रहे होते हैं, फिर भी बात नहीं बनती। धीरे-धीरे शब्द कम होने लगते हैं, आवाज़ मद्धम पड़ जाती है, और अंत में एक वाक्य हवा में तैर जाता है—"चलो छोड़ो, जाने दो।"
हम इसे समझदारी…
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