अमेरिका का स्वार्थी खेल: टैरिफ, दबाव और भारत–चीन को रोकने की साजिश

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पूनम शर्मा
आज दुनिया में यह अजीबोगरीब स्थिति है कि डोनाल्ड ट्रंप और राहुल गांधी को एक ही तराजू में तौला जा रहा है। यह न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैरेटिव कैसे गढ़े जा रहे हैं। पर असली मुद्दा व्यक्ति नहीं, नीति है — और वह नीति है अमेरिका की स्वार्थी, दबाव बनाने वाली आर्थिक और राजनीतिक चाल।

अमेरिका की  समस्या की  जड़

अमेरिका की राष्ट्रीय आय लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर है, लेकिन उसका वार्षिक खर्च 31.032 ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक है। यह घाटा किसी नई तकनीक, नवाचार या उत्पादन से नहीं, बल्कि डॉलर छापकर पूरा किया जाता है। जब डॉलर की छपाई बढ़ जाती है, तो वॉशिंगटन के नीति-निर्माता इसका बोझ बाकी दुनिया पर डालने लगते हैं।

इस बार उनका हथियार है — टैरिफ। और यह भी भेदभावपूर्ण — गरीब और विकासशील देशों पर ज्यादा टैरिफ, जबकि अमीर देशों पर कम। यही कारण है कि भारत जैसे उभरते देशों को सीधा निशाना बनाया जा रहा है।

हथियारों का धंधा और असफलता का डर

अमेरिका की दशकों पुरानी ताकत दो स्तंभों पर टिकी थी — निर्माण में दबदबा और हथियारों की बिक्री। आज निर्माण का बड़ा हिस्सा चीन के पास है, जो दुनिया के 30% उत्पाद बनाता है। हथियारों की मांग भी घट रही है। ऐसे में अमेरिका अपने पुराने ‘युद्ध और हथियार’ वाले मॉडल को छोड़ने की बजाय आर्थिक ब्लैकमेल पर उतर आया है।

चीन पर 245% तक का टैरिफ और अफ्रीका व एशिया के छोटे देशों को धमकी — यही आज की अमेरिकी रणनीति है। भारत भी इस घेरे में है, क्योंकि मेक इन इंडिया जैसी नीतियां अमेरिका के आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देती हैं।

भारत–चीन का बढ़ता प्रभाव, अमेरिका की बेचैनी

बीस साल पहले तक अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था, आज यह स्थान चीन ने ले लिया है। चीन ने यूरोप, अमेरिका और जापान से कमाई करके शिक्षा, बुनियादी ढांचे और तकनीक में निवेश किया। भारत भी अब इसी राह पर है — इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और टेक्नोलॉजी में बड़े निवेश के साथ।

यह अमेरिका के लिए पचाना मुश्किल है कि भारत और चीन बिना उसकी मदद के आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। चीन की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अब मात्र 12% है, और यदि वह यह अंतर भारत से पूरा कर ले तो अमेरिका की पकड़ और ढीली हो जाएगी।

ट्रंप का अंदरूनी खेल

ट्रंप का शासन शैली लगभग सैन्य तानाशाही जैसी है — संसद को दरकिनार करना, सोशल मीडिया से नीतियां चलाना, और आपातकाल जैसी घोषणाएं करना। यह अराजकता कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि सुनियोजित है। उनकी नीतिगत घोषणाओं से पहले ही उनके अरबपति दोस्त और फंड मैनेजर अंदरूनी जानकारी पाकर भारी मुनाफा कमा लेते हैं। यह इनसाइडर ट्रेडिंग है, जिसे देशभक्ति के नाम पर बेचा जा रहा है।

पाकिस्तान: पुराना मोहरा, नया खेल

अमेरिका पाकिस्तान को पुराने मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है। सी-पैक जैसी रकम वापस न लेने और भारत को अस्थिर करने के लिए उकसाने की नीति साफ दिखाती है कि वॉशिंगटन अभी भी शीत युद्ध की पुरानी चालें चला रहा है — पड़ोसियों को उलझाकर उनकी आर्थिक प्रगति रोकना।

अतीत से सबक

पोखरण परमाणु परीक्षण के समय भी भारत ने प्रतिबंध और अलगाव झेले थे, लेकिन उससे और मजबूत होकर निकला। फर्क बस इतना है कि आज अमेरिका की असुरक्षा कहीं ज्यादा है। वह अब अकेला आर्थिक महाशक्ति नहीं है और भारत–चीन दोनों ही उसकी शर्तों के बिना आगे बढ़ रहे हैं।

अमेरिका की असली नीति

अमेरिका का मौजूदा आर्थिक मॉडल युद्ध, अस्थिरता और कर्ज के बुलबुले पर टिका है। वह अपने अरबपतियों पर टैक्स नहीं लगाता, क्योंकि वही चुनावी अभियान का धन देते हैं। नतीजा यह है कि विकासशील देशों पर टैरिफ लगाकर, और उनके बाजारों को अस्थिर करके, वह अपनी जेब भरना चाहता है।

भारत का रास्ता

भारत को इसका जवाब झुककर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, क्षेत्रीय साझेदारी और तकनीकी नवाचार के जरिए देना होगा। जैसे पोखरण के बाद हमने मजबूती पाई थी, वैसे ही इस आर्थिक दबाव को अवसर में बदलना होगा।

दुनिया अब अमेरिका के खेल को पहचान रही है। वह डॉलर छाप सकता है, लेकिन सम्मान नहीं छाप सकता। आने वाले दशकों में नेतृत्व की कुंजी डॉलर नहीं, बल्कि आपसी भरोसा और साझेदारी होगी — और इस खेल में भारत पीछे नहीं रहेगा।

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