सीमांचल में ओवैसी की परीक्षा: क्या मुस्लिम सियासत पर लगेगा फुल स्टॉप?
बिहार चुनाव के दूसरे चरण में 122 सीटों पर मतदान, 15 सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार मैदान में
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सीमांचल की 24 सीटों पर आज मतदान
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मुस्लिम वोटों पर सभी दलों की नज़र
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कांग्रेस, आरजेडी, जेडीयू और AIMIM के बीच चतुष्कोणीय मुकाबला
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ओवैसी के लिए यह सियासी अस्तित्व की जंग
समग्र समाचार सेवा
पटना, 11 नवंबर: सीमांचल में आज की सियासी जंग
बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में मंगलवार को 122 सीटों के लिए वोटिंग हो रही है। इनमें सीमांचल की 24 सीटें भी शामिल हैं वही इलाका जिसने 2020 में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को पांच सीटों की जीत दिलाकर राज्य की सियासत में हलचल मचा दी थी।
इस बार सीमांचल की 15 सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार मैदान में हैं। सवाल यही है क्या ओवैसी एक बार फिर सीमांचल में अपना प्रभाव दोहरा पाएंगे, या उनकी मुस्लिम राजनीति पर लग जाएगा फुल स्टॉप?
सीमांचल: मुस्लिम सियासत की प्रयोगशाला
सीमांचल के चार ज़िले, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार बिहार की राजनीति में ‘मुस्लिम बेल्ट’ माने जाते हैं। यहां मुस्लिम आबादी 30 से 65 प्रतिशत तक है।
2020 में AIMIM ने इन्हीं जिलों की पाँच सीटें अमौर, बहादुरगंज, बायसी, जोकीहाट और कोचाधामन जीतकर सभी को चौंका दिया था।
लेकिन बाद में चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए, जिससे पार्टी को झटका लगा। अब AIMIM के पास एक ही विधायक अख्तरुल ईमान बचे हैं, जो इस बार फिर अमौर से चुनाव लड़ रहे हैं।
2020 का समीकरण बनाम 2025 का मुकाबला
पिछले चुनाव में सीमांचल की 24 सीटों में से:
एनडीए: 12 सीटें (बीजेपी 8, जेडीयू 4)
महागठबंधन: 7 सीटें (कांग्रेस 5, आरजेडी 1, सीपीआईएमएल 1)
AIMIM: 5 सीटें
इस बार समीकरण अलग हैं
महागठबंधन: कांग्रेस 12, आरजेडी 9, वीआईपी 2, सीपीआईएमएल 1
एनडीए: बीजेपी 11, जेडीयू 10, एलजेपी (रामविलास) 3
AIMIM: 15 सीटों पर दांव
महागठबंधन की रणनीति: ‘ओवैसी फैक्टर’ को काउंटर करना
महागठबंधन ने ओवैसी की मुस्लिम राजनीति को रोकने के लिए कई मुस्लिम चेहरों को मैदान में उतारा है।
कांग्रेस के सांसद इमरान प्रतापगढ़ी, सपा की सांसद इकरा हसन, और गाज़ीपुर से सपा सांसद अफज़ाल अंसारी, तीनों नेताओं ने सीमांचल में आक्रामक प्रचार किया।
इकरा हसन ने मुस्लिम महिलाओं से अपील की वोटों का बिखराव हुआ तो बीजेपी सत्ता में लौट आएगी।
अफज़ाल अंसारी ने कहा, ओवैसी वही काम कर रहे हैं जो आरएसएस करता है मुसलमानों को बांटना
वहीं, इमरान प्रतापगढ़ी ने AIMIM को “बीजेपी की बी-टीम” बताया
ओवैसी की चुनौती: मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण
ओवैसी की पार्टी का प्रभाव हमेशा मुस्लिम बहुल क्षेत्रों तक सीमित रहा है। हैदराबाद, महाराष्ट्र, और अब सीमांचल में वही पैटर्न दोहराया गया, मुस्लिम आबादी 50% से अधिक हो तो AIMIM को मौका मिलता है।
मगर इस बार कांग्रेस, आरजेडी और सपा का संयुक्त प्रचार AIMIM की राह मुश्किल बना सकता है।
अगर ओवैसी सीमांचल में पिछली बार जैसी सफलता नहीं दोहरा पाए, तो उनकी राष्ट्रीय मुस्लिम राजनीति की रणनीति को झटका लग सकता है।
निष्कर्ष: सीमांचल से तय होगी मुस्लिम सियासत की दिशा
सीमांचल का चुनाव सिर्फ बिहार का नहीं, बल्कि पूरे देश की मुस्लिम राजनीति का बैरोमीटर है।
अगर AIMIM यहां पिछड़ती है, तो ओवैसी की राष्ट्रीय रणनीति पर सवाल उठेंगे।
और अगर उन्होंने फिर से सीमांचल में जगह बना ली तो यह साफ संकेत होगा कि देश में “मुस्लिम पहचान आधारित राजनीति” अभी खत्म नहीं हुई है।