बनारसीदास चतुर्वेदी : फ़िजी में श्रमिकों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने वाले चिंतक

(24 दिसंबर, 1892 – 2 मई,1985)

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श्री आशुतोष चतुर्वेदी ,केन्द्रीय  सूचना आयुक्त  हैं एवं एक वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 40 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे अपने नेतृत्व, उत्कृष्ट संपादकीय कौशल और मीडिया उद्योग की गहरी समझ के लिए जाने जाते हैं।

आज अनेक नौजवान पूछते हैं कि बनारसीदास चतुर्वेदी कौन थे, ऐसे में यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि युवाओं को उनके योगदान से अवगत कराएं , यदि एक पंक्ति में बनारसीदास चतुर्वेदी का परिचय देना हो, तो कहा जाना चाहिए कि गिरमिटिया भारतीयों के दर्द को विश्व पटल पर लाने वाला और शहीदों की स्मृति को सामने लाने वाला उनके जैसा देश में कोई और नहीं हुआ  वे सादगी, समर्पण और कलम की ताकत के जीवंत प्रतीक थे. एक सच्चे ऋषि तुल्य व्यक्तित्व थे I बनारसीदास चतुर्वेदी (24 दिसंबर, 1892 – 2 मई,1985) उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में एक साधारण परिवार में जन्मे I वे 1921 के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और जेल गए महात्मा गांधी के खादी प्रचार, सविनय अवज्ञा आंदोलन और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान में उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया I गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का सानिध्य उन्हें मिला I

शुरुआती दौर में बनारसीदास जी की मुलाकात तोताराम सनाढ्य नामक एक गिरमिटिया मजदूर से हुई. तोताराम जी फिजी से 21 वर्ष की अमानवीय यातनाएं झेलकर लौटे थे I उनकी आंखों में शोषण, मजबूरी, भूख और गुलामी की पीड़ा साफ झलकती थी. बनारसीदास जी दिन रात एक कर उनकी पूरी कहानी सुनी और वे उसे लिखते रहे. उन्होंने इसे पुस्तक का रूप दिया- फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष I यह पुस्तक तोताराम सनाढ्य के नाम से प्रकाशित हुई. यह पुस्तक देश आग की तरह फैली और इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए I इसका गुजराती, मराठी, उर्दू और अन्य अनके भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ. अंग्रेजी अनुवाद गांधी जी के अनुयायी भारत भक्त सीएफ एंड्रयूज ने किया I इसके आधार पर नाटक लिखे गए जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था I पुस्तक के महात्मा गांधी अन्य नेताओं तक पहुंचने के बाद पूरे देश में गिरमिट प्रथा के खिलाफ गहरा आक्रोश उठा. अंततः 1 जनवरी 1920 को ब्रिटिश सरकार को मजबूरन गिरमिट प्रथा समाप्त करनी पड़ी I वे जीवन पर्यंत प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को लगातार उठाते रहेI  उन्होंने अनेक किताबें लिखीं- फिजी की समस्या, फिजी में भारतीय, रेखाचित्र, साहित्य और जीवन, हमारे आराध्य, प्रेरक साधक, सेतुबंध, पत्र-लेखन कला इत्यादि ।

क्रांतिकारी के संस्मरण, महापुरुषो की खोज आदि

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बनारसीदास जी शहीदों की स्मृति रक्षा के लिए लगातार सक्रिय रहे I उन्होंने शहीदों की स्मृति रक्षा के लिए शहीदों का श्राद्ध नाम से एक साहित्यिक आंदोलन छेड़ा था I शहीदों की स्मृति रक्षा के लिए उन्होंने जैसे प्रयत्न किए, शायद ही किसी और हिंदी संपादक ने किए हों. उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, जतिंद्रनाथ दास जैसे क्रांतिकारियों के संस्मरणों को संग्रहित कर प्रकाशित कराया. उन्होंने शहीदों के श्राद्ध जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया और बार-बार याद दिलाया कि हमें आजादी की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. अनेक लोगों को फांसी की सजा हुई, लाखों लोग जेल गए और अनगिनत लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दीI

वे जीवन पर्यंत हिंदी भाषा आंदोलनों, जनपदीय हिंदी के संरक्षण और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में सक्रिय बने रहे. जनवरी 1928 में मॉडर्न रिव्यू और प्रवासी के संचालक-संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय ने विशाल भारत का प्रकाशन शुरू किया और उसका संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी को बनाया गया. सन् 1937 तक बनारसीदास जी ने कोलकाता में बैठकर इसका संपादन किया I बनारसी दास चतुर्वेदी के कार्यकाल में विशाल भारत अपने समय का सबसे हिंदी का सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पत्र बन गया था. विशाल भारत ने तीन बड़े आंदोलन चलाए. एक था- घासलेटी साहित्य विरोधी आंदोलन. इसका असर यह हुआ कि गोरखपुर के हिंदी साहित्य सम्मेलन में घासलेटी साहित्य की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित हुआ था. एक और आंदोलन था- कस्मै देवाय यानी हम किसके लिए लिखें. दूसरी ओर विशाल भारत ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, दिनकर, प्रेमचंद, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सियाराम शरण गुप्त, गोपाल सिंह नेपाली, गुरुभक्त सिंह, श्रीमती कमला चौधरी, श्रीमती सत्यवती मलिक, वृंदावन लाल वर्मा, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, हरिवंशराय बच्चन, सोहन लाल द्विवेदी, शिवमंगल सिंह सुमन आदि श्रेष्ठ रचनाकारों को हिंदी के पाठकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई I

विशाल भारत की एक और देन थी, इसकी अंतरराष्ट्रीय दृष्टि. शेक्सपियर, मिल्टन, वुड्सवर्थ के बारे में तो हिंदी पाठकों को जानकारी थी  लेकिन अमेरिकी विचारक एमर्सन और थोरो से पाठकों का परिचय विशाल भारत ने ही कराया था. विशाल भारत के माध्यम से मैक्सिम गोर्की, आंतोन चेखव आदि अनेक रूसी लेखकों की रचनाएं हिंदी पाठकों को पढ़ने के लिए मिलीं. प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्रिंस क्रोपाटिकिन व मैल्टेस्टा जैसे अराजकवादियों के विचार विशाल भारत के माध्यम से ही हिंदी पाठकों तक पहुंचे थे I ऑस्ट्रेलियाई कथाकार स्टीफन ज्वाइग, जापानी लेखक कागावा और अमेरिकी लेखिका पर्ल बक का परिचय विशाल भारत ने हिंदी पाठकों से कराया था I यह भी बनारसीदास चतुर्वेदी की अपनी दृष्टि थी कि उन्होंने अहिंदीभाषी क्षेत्रों खासकर दक्षिण के राज्यों में हिंदी के प्रचार कार्य से भी हिंदी पाठकों को परिचित कराया I

ओरछा नरेश वीर सिंह जू देव के प्रस्ताव पर बनारसीदास चतुर्वेदी ने टीकमगढ़ से मधुकर का प्रकाशन प्रारंभ किया. यहां उन्होंने जनपदीय आंदोलन का सूत्रपात किया. यह पत्र जनपदीय समस्याओं पर अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करता था I  इसका प्रकाशन छह वर्षों तक चला. मधुकर ने अनेक जनपदीय आंदोलनों को जन्म दिया I इसी दौर में मथुरा में ब्रज साहित्य मंडल की स्थापना हुई. इसी प्रकार की चेतना विभिन्न जनपदों में प्रारंभ हुई और कई पत्र पत्रिकाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों को पत्र लिखे I उनका पत्र लेखन असाधारण रूप से व्यापक था. वह उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा ही बन गया था Iउनके द्वारा लिखे गये पत्रों की संख्या एक लाख से अधिक है. इसे उन्होंने एक विधा के रूप में विकसित किया.
शायद कम ही लोगों को इस बात की जानकारी है कि श्रमजीवी पत्रकारों के पक्ष में वे सबसे पहले आगे आये थे I अखिल भारतीय हिंदी पत्रकार संघ का पहला अधिवेशन दिसंबर, 1945 में मथुरा में हुआ था और बनारसीदास चतुर्वेदी उसके निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे I  इसके पहले 22 फरवरी, 1942 को कानपुर में बनारसीदास चतुर्वेदी की अध्यक्षता में संयुक्त प्रांतीय हिंदी पत्रकार सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था. इसमें कोई पत्र संचालक शामिल नहीं किया गया था. इसके एक सप्ताह बाद दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी पत्रकार संघ का अधिवेशन हुआ था I इस सम्मेलन में एक प्रस्ताव किया गया कि हिंदी पत्रकारों का न्यूनतम वेतन 40 रुपए मासिक होना चाहिए. आजादी के बाद बनारसीदास जी 12 वर्ष तक राज्यसभा के सदस्य रहे. संसद सदस्य होने के बावजूद उनका रहन-सहन पहले जैसा साधारण और निष्काम बना रहा.Iसन् 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. बनारसी दास चतुर्वेदी एक सामान्य साहित्यकार-पत्रकार नहीं थे. वह एक चिंतक, वैचारिक संघर्ष और संस्कृति के जीवंत वाहक थे I

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