औपनिवेशिक दौर की विरासत लौटाने की ऐतिहासिक पहल

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पूनम शर्मा
लंदन स्थित Welcome Collection ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 2000 से अधिक दुर्लभ जैन पांडुलिपियों को जैन समुदाय को वापस सौंपने की घोषणा की है। यह संग्रह 15वीं से 19वीं शताब्दी के बीच की अमूल्य हस्तलिखित धरोहरों का हिस्सा है, जिन्हें लंबे समय से ब्रिटेन में संरक्षित रखा गया था। इस फैसले को सांस्कृतिक न्याय, धार्मिक विरासत की पुनर्स्थापना और औपनिवेशिक काल में ले जाई गई भारतीय धरोहरों की वापसी की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा है।

दुर्लभ पांडुलिपियों में क्या-क्या शामिल है

वापस की जा रही पांडुलिपियों में जैन धर्म के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ कल्पसूत्र, चिकित्सा से जुड़ा ग्रंथ वैद्यमनोत्सव और कई धार्मिक, दार्शनिक तथा साहित्यिक रचनाएँ शामिल हैं। इनमें संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, राजस्थानी और प्रारंभिक हिंदी में लिखे गए दुर्लभ दस्तावेज भी मौजूद हैं। कुछ पांडुलिपियाँ चित्रित हैं और उनमें तत्कालीन भारतीय कला, चिकित्सा विज्ञान तथा सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस संग्रह में मौजूद कुछ ग्रंथ भारतीय चिकित्सा और वैचारिक इतिहास के सबसे पुराने उपलब्ध स्रोतों में गिने जाते हैं। इनमें 1592 का एक प्राचीन हिंदी चिकित्सा ग्रंथ भी शामिल है, जिसे प्रारंभिक हिंदी चिकित्सा साहित्य का महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।

कैसे पहुंचे थे ये ग्रंथ ब्रिटेन

इन पांडुलिपियों को करीब एक सदी पहले ब्रिटिश उद्योगपति और संग्रहकर्ता Henry Wellcome के एजेंटों द्वारा खरीदा गया था। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें से बड़ी संख्या पंजाब क्षेत्र के एक जैन मंदिर से बहुत कम कीमत पर ली गई थी। वह मंदिर अब अस्तित्व में नहीं है।

वेलकम कलेक्शन ने स्वयं स्वीकार किया है कि इन ग्रंथों का अधिग्रहण औपनिवेशिक सत्ता संरचनाओं और असमान परिस्थितियों में हुआ था। संस्था ने माना कि यह खरीद मूल मालिकों के हितों के अनुरूप नहीं थी। यही कारण है कि अब इन धरोहरों की वापसी को नैतिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है।

जैन समुदाय ने फैसले का किया स्वागत

Institute of Jainology और जैन विद्वानों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह केवल पांडुलिपियों की वापसी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान और ऐतिहासिक न्याय की पुनर्स्थापना है।

संस्था से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि विभाजन और उसके बाद के उथल-पुथल में कई जैन धरोहरें नष्ट हो गई थीं। ऐसे में इन पांडुलिपियों का सुरक्षित बच जाना और अब समुदाय तक लौटना बेहद महत्वपूर्ण है।

कहाँ रखा जाएगा यह संग्रह

फिलहाल इन पांडुलिपियों को University of Birmingham के धमनाथ नेटवर्क फॉर जैन स्टडीज़ में संरक्षित किया जाएगा। वहां शोधकर्ताओं और जैन समुदाय को इन दुर्लभ ग्रंथों तक पहुंच उपलब्ध कराई जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जैन अध्ययन, भारतीय इतिहास, चिकित्सा परंपरा और प्राचीन भारतीय ज्ञान पर नए शोध को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, यह विश्वभर के संग्रहालयों और संस्थानों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है कि औपनिवेशिक काल में प्राप्त सांस्कृतिक धरोहरों के साथ नैतिक व्यवहार कैसे किया जाए।

सांस्कृतिक विरासत की वापसी का नया अध्याय

हाल के वर्षों में दुनिया भर में संग्रहालयों पर यह दबाव बढ़ा है कि वे औपनिवेशिक काल में ले जाई गई वस्तुओं और धरोहरों को उनके मूल समुदायों को लौटाएं। वेलकम कलेक्शन का यह कदम उसी वैश्विक बहस का हिस्सा माना जा रहा है।

भारत के लिए यह केवल ऐतिहासिक महत्व की घटना नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, ज्ञान परंपरा और धार्मिक विरासत को पुनः सम्मान दिलाने का अवसर भी है। जैन समुदाय के लिए यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों को अपनी प्राचीन परंपराओं से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक क्षण साबित हो सकता है।

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