उत्तराखंड : मदरसा बोर्ड भंग कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू किया

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  • उत्तराखंड सरकार ने मदरसा बोर्ड भंग कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू किया
  • 500 मदरसों को मिलने वाली सरकारी ग्रांट 2027–28 से बंद
  • अब सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को नई मान्यता और राज्य बोर्ड से संबद्धता जरूरी
  • धार्मिक नेताओं और विपक्ष का विरोध, कोर्ट के संतुलित रुख की ओर इशारा
  • सरकार का दावा—शिक्षा के नए अवसर, धार्मिक पहचान सुरक्षित

समग्र समाचार सेवा

देहरादून | 17  जुलाई : 500 मदरसों की सरकारी ग्रांट बंदउत्तराखंड सरकार ने राज्य के लगभग 500 मदरसों को मिलने वाली सरकारी ग्रांट 2027–28 से बंद करने का निर्णय लिया है। यह फैसला उस समय आया जब पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को भंग कर उसकी जगह ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USAME) का गठन किया। इस नए प्राधिकरण के दायरे में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी—छहों अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के सभी शिक्षण संस्थान आएंगे।सरकार के अनुसार, मदरसा बोर्ड ने 1 जुलाई 2026 से औपचारिक रूप से कार्य करना बंद कर दिया है। अब सभी मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को नई अथॉरिटी के तहत लाया गया है। लगभग 452 पंजीकृत मदरसों में 50,000 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं।

अब कक्षा 1 से 8 तक के मदरसों को जिला स्तर पर मान्यता मिलेगी, जबकि कक्षा 9 से 12 तक के 52 सीनियर मदरसों को उत्तराखंड बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। मान्यता की प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी गई है और यह तीन शैक्षणिक सत्रों के लिए मान्य रहेगी।सरकार का तर्क है कि नए प्राधिकरण से छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा मिलेगी और उनके उच्च शिक्षा व सरकारी नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे। धार्मिक प्रमाणपत्र (मौलवी, आलिम, मुंसीफ) को अब सरकारी भर्ती में मान्यता नहीं मिलेगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी समुदाय की पहचान या परंपरा को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि सभी को बेहतर शैक्षणिक अवसर देने के लिए है। “हमारी कोशिश है कि बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें और साथ ही विज्ञान, गणित, कंप्यूटर, कौशल विकास और आधुनिक शिक्षा में दक्ष हों,” उन्होंने कहा।हालांकि, इस निर्णय पर धार्मिक नेताओं और विपक्षी सांसदों ने आपत्ति जताई है। जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष प्रो. मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा, “राज्य सरकार का यह कदम अल्पसंख्यक शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करेगा।” समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने भी फैसले को संविधान विरोधी बताते हुए इसकी समीक्षा की मांग की।सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यूपी मदरसा एक्ट की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को शैक्षिक मानकों और अल्पसंख्यक अधिकारों में संतुलन रखना होगा

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