पूनम शर्मा
तस्वीर FSL टीम की है। फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की। दिल्ली के कॉकरेच पार्टी द्वारा उपद्रव किए गए घटनास्थल की। हर टूटी हुई गाड़ी, पुलिस की वर्दी और रास्ते में पड़े फूलों तक — जितनी भी चीजें घटना में छुई गई थीं, उन सब से फिंगरप्रिंट (अंगुलियों के निशान) इकट्ठा किए जा रहे हैं।
जिन लोगों ने दूसरों के उकसावे में पुलिस पर हमला किया, पुलिस की गाड़ी तोड़ी, पत्थर फेंके, उनकी जिंदगी शुरू होने से पहले ही निश्चित खतरे की ओर बढ़ रही है।
इन उपद्रवकारियों में ज्यादातर 20 से 25 साल के युवक-युवतियां हैं। बहुत जल्द उन्हें पछताना पड़ेगा कि उन्होंने ये सब करके कितनी बड़ी गलती कर दी।
अब इन फिंगरप्रिंट को पहले आधार डेटा से मिलाया जाएगा, फिर दिल्ली पुलिस की ओर से उनके घर एक “लव लेटर” आएगा, जिसमें साफ लिखा होगा कि 20 जुलाई की घटना के संदर्भ में उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया है। उसके बाद कानूनी प्रक्रिया चलेगी। वैसे भी जिन मामलों में पुलिस गवाह होती है, उनसे छूट पाना बहुत मुश्किल होता है।
ऐसे मामलों का असर भविष्य में सरकारी नौकरी की योग्यता, पासपोर्ट मिलने, और यहां तक कि निजी क्षेत्र की नौकरी के मौके पर भी पड़ सकता है। क्योंकि अब कई निजी कंपनियां भी कैंडिडेट का बैकग्राउंड चेक करती हैं। तब न राहुल गांधी, न अरविंद केजरीवाल, न अखिलेश यादव, न अभिजीत दीपके आकर बचा सकते हैं। फालतू गुंडागर्दी करने वाले छात्र-छात्राएं और दूसरे आम लोग, जिन्हें इन नेताओं ने परोक्ष रूप से उकसाया — जैसे अभिजीत दीपके, सौरभ दास, प्रकाश राज, संजय सिंह, मनीष सिसोदिया, डिंपल यादव, हनुमान बेनीवाल, या चंद्रशेखर “रावण” — असल में फंस गए हैं। लेकिन नुकसान छात्रों का हुआ। अब भविष्य की जिंदगी खत्म। सरकारी नौकरी का रास्ता बंद। पुलिस ऐसे मामलों में कानूनी तरीके से जो कर सकती है, सब करेगी। दिल्ली में वही होने जा रहा है।