तिब्बत का “वाटर बम” नहीं बचा पाए चीनी आपदा प्रबंधक

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पुष्परंजन
नेपाल में तबाही की शुरुआत तिब्बत के शिज़ांग स्वायत्त क्षेत्र से हुई. इस बार यह “वाटर बम” साबित हुआ है. चीन, ‘ऑन द रिकार्ड’ उस इलाक़े में प्रकृति से छेड़छाड़ स्वीकार नहीं कर रहा है. लेकिन, जो ख़बरें तिब्बत से छनकर निकली हैं, उससे स्पष्ट हुआ है कि चीन का आपदा प्रबंधन नाकाम साबित हुआ है. तबाही नेपाल के दूसरी तरफ तिब्बत में भी बड़े स्केल पर हुई है. शिगाज़े शहर के ग्यिरोंग पोर्ट एरिया, ग्यिरोंग टाउनशिप में हुई बर्बादी की दास्ताँ चीन छिपा रहा है. गुरुवार सुबह 8 बजे तक ग्यिरोंग में तीन लोगों की मौत हो गई थी, 558 लोग लापता हैं, जबकि दो स्थानीय गांव वालों को बचा लिया गया था। लापता लोगों में से 260 की पहचान विदेशी नागरिकों के तौर पर हुई है। चीन की रेस्क्यू टीम बुधवार को जब कुछ कर नहीं पाई, तो गुरुवार को चीन ने बचाव अभियान और तेज़ कर दिया।

111 सदस्यों वाली बचाव टीम को एयरलिफ़्ट करके आपदा वाले इलाके में भेजा गया. इमरजेंसी कम्युनिकेशन के लिए ‘विंग लोंग-ड्रोन’ तैनात किया गया, और सेना की वेस्टर्न थिएटर कमांड की निगरानी में ‘वाई-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट’ भेजा गया। भोटे कोशी नदी का उद्गम शिशापांगमा पर्वत के पास झांगझांगबो ग्लेशियर क्षेत्र है। तिब्बत में इस नदी को मुख्य रूप से पोइकु’ (या पोइंकू चू / बोक्शू) नाम से जाना जाता है। जुलाई 1981 में इस क्षेत्र की सिरेंमाको हिमनद में भारी जलप्रलय हुआ था, तब ‘चीन-नेपाल फ्रेंडशिप ब्रिज’ और सुन कोशी हाइड्रोपावर प्लांट के कुछ हिस्से तबाह हो गए थे. 45 साल बाद भी प्रकृति से खिलवाड़ रुका नहीं, और इसका परिणाम लाशों की ढेर में दुनिया के सामने है. जो सैकड़ों लोग लापता हैं, न जाने उनका क्या हाल होगा?

शिज़ांग ऑटोनॉमस रीजन चीन के दक्षिण-पश्चिमी बॉर्डर पर है. शिज़ांग नाम का अर्थ है “पश्चिमी खज़ाना.” क्योंकि, यहाँ खनिजों का विशाल भंडार है। खनन के ज़रिये यहाँ से तांबा, लिथियम और ‘रेयर अर्थ मटीरियल’ का ज़बरदस्त दोहन हुआ है, जो चीन के राष्ट्रीय उद्योगों को सहारा देती है। जून 2026 में चाइना डेली की रिपोर्ट के अनुसार, ‘वैज्ञानिकों को दक्षिणी शिज़ांग के डिंगग्ये इलाके में चट्टानों की ऐसी संरचनाएं मिली हैं, जिनसे उच्च शुद्धता वाला क्वार्ट्ज़ तैयार होता है। इस सामग्री का इस्तेमाल सेमीकंडक्टर और एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी बनाने में किया जाता है।’ “दुनिया की छत” के नाम से विख्यात शिज़ांग के उत्तर में शिनजियांग, उत्तर-पूर्व में किंघई, पूर्व-पश्चिम में सिचुआन और दक्षिण-पूर्व में युन्नान है. दक्षिण-पश्चिम में म्यांमार, भारत, भूटान और नेपाल जैसे देशों के साथ इसकी सीमाएँ लगती हैं।

शिज़ांग स्वायत क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी तिब्बत का गेटवे है। यारलुंग ज़ंगबो (ब्रह्मपुत्र) जैसी बड़ी नदियाँ इसी क्षेत्र से निकलती हैं। तिब्बत के लिंझी क्षेत्र में यारलुंग ज़ंगबो जल-विद्युत परियोजना दुनिया की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना है। यहाँ निर्मित बांध चीन के ही ‘थ्री गॉर्जेस बांध’ से लगभग तीन गुना बड़ा है। यदि यहाँ कुछ हुआ, तो नेपाल से भी कई सौ गुना ज़्यादा बड़ी तबाही मचेगी।

7 से 11 सितंबर 2025 को चीनी पीपल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (सीपीसीसी) की नेशनल कमिटी ने शिज़ांग स्वायत क्षेत्र का दौरा किया था। टीम के सदस्यों ने पर्यावरण मंत्रालय को आगाह किया था, कि जितने बड़े पैमाने पर शिज़ांग स्वायत्त क्षेत्र में खनन हो रहा है, वह पर्यावरण की दृष्टि से जोखिम भरा है. बुधवार की तबाही वाकई साल भर पहले दी गई चेतावनी को सच साबित कर गई. भूवैज्ञानिक आपदा तकनीकी मार्गदर्शन केंद्र के वरिष्ठ इंजीनियर चेन होंगकी ने सीसीटीवी न्यूज़ से कहा कि बचाव कार्यों में काफी मुश्किलें आ रही हैं, जिन्हें चार भागों में बांटा जा सकता है। सीसीटीवी न्यूज़, चीन का राष्ट्रीय टेलीविजन प्रसारक है।

चेन होंगकी ने कहा कि पहला लैंडस्लाइड के स्रोत वाली क्षतिग्रस्त जगह की स्थिरता स्पष्ट नहीं है. इसके अलावा, इस इलाके में ऊंचे पहाड़, सँकरी गहरी घाटियां, जल जमाव की समस्या बचाव कार्यों को प्रभावित करने वाला एक अहम कारक बन जाती है। शिज़ांग में भूस्खलन और रास्तों पर पत्थर गिरने जैसी घटनाओं से बचने के लिए सख्त सावधानी बरतने की ज़रूरत है। शिन्हुआ के अनुसार, स्थानीय मौसम विभाग ने बुधवार शाम से रविवार तक गिरोंग काउंटी में लगातार बारिश का अनुमान लगाया है. इसके हवाले से निचले इलाकों में बाढ़, लैंडस्लाइड और अन्य दूसरी आपदाओं की चेतावनी दी है।

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