पूनम शर्मा
हिमालय में प्रकृति के भयावह प्रकोप ने नेपाल को गहरे मानवीय संकट में डाल दिया है। अचानक आई बाढ़, हिमनद के ढहने और उसके बाद हुए भूस्खलन ने नेपाल के रासुवा जिले से लेकर चीन के तिब्बत सीमा क्षेत्र तक भारी तबाही मचाई है। आपदा के छठे दिन भी हजारों लापता लोगों की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर बचाव अभियान जारी है। दूसरी ओर, अपने परिजनों की कोई खबर नहीं मिलने से हजारों परिवारों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
नेपाल के आपदा प्राधिकरण के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में 903 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4,247 लोग अभी भी लापता हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 लोगों की मौत हुई है और 546 लोग लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल और चीन को मिलाकर लापता लोगों की संख्या 4,793 तथा पुष्टि की गई मौतों की संख्या 919 हो गई है।
इस विनाशकारी आपदा की शुरुआत 26 अगस्त को हुई। तिब्बत सीमा से लगे नेपाल के रासुवा जिले में एक हिमनद के टूटने के बाद भोटेकोशी नदी में अचानक भारी मात्रा में पानी, बर्फ, चट्टान और मलबा आ गया। कुछ ही समय में नदी का जलस्तर बेहद खतरनाक रूप से बढ़ गया। तेज बहाव ने नदी के दोनों किनारों पर मौजूद बस्तियों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया।
इस प्राकृतिक आपदा के भयावह क्षण का एक महत्वपूर्ण दृश्य ड्रोन कैमरे में भी कैद हुआ है। एक चीनी फोटोग्राफर द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो में लांगटांग लिरुंग चोटी के पास पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा तथा हिमनद टूटकर नीचे गिरता दिखाई देता है। यह क्षेत्र 7,200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित है। वहां से बर्फ, चट्टानों और धूल का विशाल मलबा करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में आ गिरा। इसके बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों का जलस्तर अचानक काफी बढ़ गया।
लापता लोगों में कई देशों के नागरिक शामिल
इस आपदा का असर केवल नेपाली नागरिकों तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी लापता हैं। नेपाल की आपदा एजेंसी के अनुसार, देश में 592 विदेशी नागरिकों के बारे में अभी जानकारी नहीं मिल सकी है। वहीं चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी कम से कम 261 विदेशी नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
भारत के लिए भी स्थिति चिंताजनक है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, नेपाल में 275 भारतीय नागरिक और 128 भारतीय मूल के लोग लापता हैं। दूसरी ओर, चीन के क्षेत्र में करीब 900 भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं और उनसे संपर्क स्थापित किया जा चुका है। तिब्बत में 49 भारतीय नागरिकों के लापता होने की भी जानकारी सामने आई है।
नेपाल में भारत के अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में पर्यटक और तीर्थयात्री पहुंचे थे। तमिलनाडु से गए लोगों को लेकर भी चिंता बनी हुई है। राज्य विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, तमिलनाडु से 305 लोग नेपाल गए थे। इनमें से 220 लोगों के सुरक्षित होने की पुष्टि हुई है, जबकि 84 लोगों से अभी संपर्क नहीं हो पाया है। अब तक 21 तमिलनाडु के तीर्थयात्री सुरक्षित वापस लौट चुके हैं।
हालांकि, इन आंकड़ों में एक विसंगति भी सामने आई है। यदि 305 लोगों में से 220 सुरक्षित हैं तो शेष संख्या 85 होती है, जबकि मंत्री ने संपर्क से बाहर लोगों की संख्या 84 बताई है। एक व्यक्ति की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। इस तरह की अनिश्चितता ने प्रभावित परिवारों की बेचैनी और बढ़ा दी है।
राहत और बचाव अभियान के सामने बड़ी चुनौती
आपदा के छठे दिन भी बचाव अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। पहाड़ी इलाकों में टूटे हुए रास्ते, भारी मलबा, चट्टानों का ढेर और नदियों का तेज बहाव राहत एवं बचाव दलों के सामने बड़ी बाधा बन रहे हैं। हजारों लोगों के अब भी लापता होने के कारण तलाशी अभियान का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है।
नेपाल में लापता लोगों में जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले 933 कर्मचारी, 45 नेपाली सेना के जवान, 38 पुलिस और सशस्त्र पुलिसकर्मी तथा 18 सीमा शुल्क एवं आव्रजन अधिकारी भी शामिल हैं। सबसे अधिक प्रभावित नुवाकोट जिले में ही 1,158 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
इस बीच भारत की कई नदियों से सात शव बरामद किए गए हैं। आशंका है कि ये शव नेपाल में आई बाढ़ में बहकर भारत पहुंचे लोगों के हो सकते हैं। हालांकि, इन शवों को फिलहाल आधिकारिक मृतक संख्या में शामिल नहीं किया गया है।
नेपाल की यह त्रासदी हिमालयी क्षेत्र में हिमनदों और बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़े खतरों की गंभीरता को भी सामने लाती है। एक हिमनद के टूटने से कुछ ही समय में विशाल बाढ़ और मलबे का प्रवाह पैदा हो सकता है, जिसने पूरे क्षेत्रों को तबाह कर दिया।
अब बचाव दलों की सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे और दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों को जीवित बाहर निकालना और लापता लोगों का पता लगाना है। हर गुजरते घंटे के साथ परिजनों की उम्मीद और चिंता दोनों बढ़ रही हैं। 4,000 से अधिक लोगों के अभी भी लापता होने के कारण इस आपदा की वास्तविक मानवीय त्रासदी का पूरा आकलन फिलहाल संभव नहीं है।