इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: DU छात्रा की रासुका रद्द
नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में वेतन वृद्धि को लेकर हुए श्रमिकों के प्रदर्शन के मामले में अदालत ने पुलिस प्रशासन को लगाई फटकार, मुआवजे का आदेश।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा वर्कर आंदोलन के दौरान डीयू छात्रा आकृति चौधरी पर लगाई गई रासुका (NSA) को रद्द कर दिया है।
- कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि छात्रा को ₹5 लाख का मुआवजा दिया जाए, जिसे दोषी अधिकारियों के वेतन से वसूला जाएगा।
- अदालत ने पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को “गढ़ी हुई कहानी” करार देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
समग्र समाचार सेवा
प्रयागराज / नई दिल्ली, 9 सितंबर: न्यायपालिका और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की पूर्व छात्रा और कानून की पढ़ाई करने वाली आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA/रासुका) को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्क और साक्ष्य आधारहीन थे और यह पूरी कार्रवाई प्रशासनिक मनमानी को दर्शाती है। इस फैसले के बाद से पूरे राज्य के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?
इस साल अप्रैल के महीने में नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में विभिन्न कंपनियों के संविदा और औद्योगिक श्रमिकों द्वारा वेतन बढ़ोतरी तथा पड़ोसी राज्य हरियाणा के बराबर वेतनमान की मांग को लेकर बड़ा प्रदर्शन किया गया था। इस दौरान 10 से 18 अप्रैल के बीच हुए आंदोलन ने तूल पकड़ लिया और 13 अप्रैल को स्थिति हिंसक हो गई थी, जिसमें पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई थीं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने और कथित तौर पर भीड़ को उकसाने के आरोप में डीयू की छात्रा आकृति चौधरी को गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद, पिछले साल मई महीने में गौतमबुद्ध नगर प्रशासन की संस्तुति पर उन पर बेहद सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई कर दी गई थी, जिसके चलते उन्हें करीब पांच महीने जेल में बिताने पड़े।
अदालत ने पुलिस के दावों और सबूतों को नकारा
सुनवाई के दौरान जब हाईकोर्ट ने पुलिस और सरकारी वकीलों से उस इलेक्ट्रॉनिक या वीडियोग्राफिक सबूत को पेश करने को कहा, जिसके आधार पर छात्रा पर भीड़ को भड़काने का दावा किया गया था, तो प्रशासन संतोषजनक साक्ष्य पेश करने में विफल रहा। अदालत ने पाया कि आकृति चौधरी को पुलिस ने 12 अप्रैल को ही हिरासत में ले लिया था, जबकि मुख्य हिंसा और उपद्रव की घटनाएं 13 अप्रैल को हुईं। न्यायाधीशों ने इस विसंगति पर कड़ा रुख अपनाते हुए सवाल उठाया कि जो व्यक्ति पहले से ही पुलिस हिरासत में था, वह बाद में हुई हिंसा के लिए कैसे जिम्मेदार हो सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई ठोस दस्तावेज या वीडियो नहीं था जो यह साबित कर सके कि उन्होंने किसी प्रकार की हिंसा के लिए उकसाया था।
दोषी अधिकारियों के वेतन से कटेगा पांच लाख का मुआवजा
इस ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट ने केवल नजरबंदी को ही अवैध नहीं ठहराया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की। अदालत ने गौतमबुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट (DM) और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली की तीखी आलोचना करते हुए इसे मनमाना करार दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़ित छात्रा को राज्य सरकार की ओर से 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। सबसे खास बात यह है कि यह मुआवजा सरकारी खजाने से नहीं बल्कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों—जिनमें जिला मजिस्ट्रेट और मामले से जुड़े अन्य अधिकारी शामिल हैं—के व्यक्तिगत वेतन से काटा जाएगा। अदालत की इस सख्त टिप्पणी से यह संदेश गया है कि कानून के दुरुपयोग पर न्यायपालिका सख्त रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगी।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर टिप्पणी
अपने फैसले में खंडपीठ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) का जिक्र करते हुए कहा कि नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का पूरा मौलिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन एक “सेफ्टी वाल्व” की तरह कार्य करते हैं, जिन्हें इस तरह कठोर दमनकारी नीतियों से दबाया नहीं जा सकता। यदि प्रशासनिक मशीनरी केवल अपनी शक्तियों के अहंकार में बिना ठोस सबूत के किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) पर हमला करती है, तो न्यायालय मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकते। यह निर्णय भविष्य में कानून के दायरे में रहकर काम करने वाले प्रशासन और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिहाज से एक मील का पत्थर साबित होगा।