राजस्थान निकाय चुनाव में बीजेपी सबसे आगे

राज्य के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे घोषित, बीजेपी ने हासिल की बढ़त, कांग्रेस ने भी दी कड़ी टक्कर।

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  • राजस्थान निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बढ़त बनाते हुए 4023 वार्डों पर जीत दर्ज की है।
  • मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 3038 सीटों पर कब्जा जमाया है।
  • बड़ी संख्या में 2435 निर्दलीय उम्मीदवारों के जीतने से कई नगर निकायों में बोर्ड गठन के लिए उनकी भूमिका बेहद अहम हो गई है।

समग्र समाचार सेवा
जयपुर, 15 सितंबर: राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुए शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को काफी तेज कर दिया है। राज्य के विभिन्न नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पालिकाओं के लिए हुए इन चुनावों में राजनीतिक दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राज्यभर में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 4023 वार्डों पर अपनी जीत का परचम लहराया है। वहीं, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने भी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए 3038 वार्डों पर जीत हासिल की है। इन आंकड़ों से साफ है कि प्रदेश के शहरी मतदाताओं ने दोनों ही प्रमुख दलों को लेकर अपनी मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है।

निर्दलीय उम्मीदवारों की बढ़ी ताकत और अहम भूमिका

इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों ने दोनों प्रमुख दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। कुल 2435 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है। कई नगर निकायों और निगमों में किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति बन गई है, जिसके चलते अब बोर्ड गठन और महापौर या अध्यक्ष के चुनाव में इन निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। राजनीतिक दल अब इन बागी और स्वतंत्र जीते हुए उम्मीदवारों को अपने पाले में लाने के लिए जोड़-तोड़ और बैठकों के दौर में जुट गए हैं, ताकि सत्ता की चाबी उनके हाथ लग सके।

प्रमुख नगर निगमों का हाल और राजनीतिक समीकरण

राज्य के प्रमुख महानगरों जैसे जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अजमेर के नगर निगम परिणामों में भी दिलचस्प आंकड़े सामने आए हैं। कई जगहों पर बीजेपी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, तो कुछ निगमों में कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी है। इसके अलावा कुछ ऐसे निकाय भी हैं जहां निर्दलीयों की संख्या इतनी अधिक है कि बिना उनके समर्थन के बोर्ड का गठन होना नामुमकिन सा लग रहा है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में होने वाले महापौर और सभापति के चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है और दोनों ही दल अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में व्यस्त हैं।

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