राकेश अचल
पिछले तीन साल से बैशाखियों के सहारे सरकार चलाने की आदी हो चुकी भाजपा ने पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले ही अपने लिए बैशाखी तलाश ली है।ये बैशाखी है शिरोमणि अकाली दल (बादल) की।दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल शुक्रवार को कहा है कि उनकी पार्टी समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार है।
सुखबीर की इस घोषणा से एक बात साबित हो गयी है कि पंजाब में भाजपा के बिना उनकी गुजर नही होने वाली।इस गठजोड को ‘तो कों और,न मो कों ठौर’ कहते हैं।इसे और समझना हो तो आप कह सकते हैं’ ‘एक के पास हडिया,दूसरे के पास पारा’ अर्थात यदि भाजपा के पास मटकी है तो ढक्कन नहीं और सुखवीर के पास ढक्कन है तो मटकी नहीं।दोनों एक-दूसरे की जरूरत पूरी कर सकते हैं।
अभी दो दिन पहले बृहस्पतिवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि पंजाब में इस बार एनडीए की सरकार बनेगी
शाह के बयान के बाद पंजाब और देशभर की राजनीति में यह अटकलें लगी थी कि बहुत जल्द बीजेपी-शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन का ऐलान हो सकता है।और अब इसकी औपचारिक घोषणा हो चुकी है।
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा के चुनाव होने हैं। उससे पहले आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली भगवंत मान सरकार राज्य में बढ़ते नशे के आरोपों और नशा विरोधी कार्यकर्ताओं की मौत के मामलों को लेकर घिरी हुई है।
सुखबीर सिंह बादल कहते हैं कि “अकाली दल के लिए पंजाब नंबर वन है। सरकार आए या ना आए, हम पंजाबियों की लड़ाई लड़ते रहेंगे। हमारे लिए दो पार्टियां पंजाब की सबसे बड़ी दुश्मन हैं, पहली कांग्रेस और दूसरी आम आदमी पार्टी।”
पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने कहा कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ अकाली दल का कोई गठजोड़ नहीं हो सकता। सुखबीर बादल ने कहा, “इसके अलावा बहुत सारी पाटियां हैं जो शिरोमणि अकाली दल की विचारधारा के साथ सहमत हैं, जो अकाली दल की विचारधारा के प्रोग्राम से सहमत हैं, हम ओपन हैं।”
शिरोमणि अकाल दल कोई 106 साल पुराना संगठन है।शिरोमणि अकाली दल की स्थापना 14 दिसंबर 1920 को हुई थी। यह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के टास्क फोर्स के रूप में बनी, जिसका मकसद गुरुद्वारों को महंतों (ब्रिटिश नियुक्त पुजारियों) के नियंत्रण से आजाद कराना था। इसे पहले गुरुद्वारा सेवक दल कहा जाता था।
1960-70 के दशक में पार्टी कई गुटों में बंटी (मास्टर तारा सिंह बनाम संत फतेह सिंह आदि)।प्रकाश सिंह बादल का उदय इसी के बाद हुआ। जहाँ तक मुझे याद है कि 1970 में पहली बारप्रकाश सिंह बादल जनसंघ से गठबंधन कर गठबंधन कर मुख्यमंत्री बने थे।1977 में वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
वर्ष 1980 के दशक में आपातकाल विरोध, आनंदपुर साहिब प्रस्ताव और फिर आतंकवाद के दौर में पार्टी लोंगोवाल, तलवंडी, बरनाला, बादल गुटों में बंट गयी।1986 में सुरजीत सिंह बरनाला सरकार के दौरान स्वर्ण मंदिर से उग्रवादियों को निकालने के ऑपरेशन के विरोध में प्रकाश सिंह बादल 27 विधायकों के साथ अलग हो गए और अकाली दल (बादल) गुट बनाया। बाद में यही मुख्य शिरोमणि अकाली दल बन गई।।
1990 के दशक में बादल ने ज्यादातर मध्यमार्गी गुटों को अपने साथ मिलाया।1996 में पार्टी अध्यक्ष बने। मोगा घोषणा में पार्टी को “पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत” की पार्टी घोषित किया।
जनसंघ से लेकर भाजपा और बादल का गठबंधन पुराना है।इसी बिना पर बादल युग (1996 से लगभग 2024-25 तक चला।पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल ने बाद में अकाली दल को अपनी जेबी पार्टी बना दिया।वर्ष 2008 में बेटे सुखबीर सिंह बादल को पार्टी अध्यक्ष बनाया।पार्टी को परिवारवाद का आरोप लगता रहा।फिर भी शिरोभणि अकाली प्रबंधक कमेटी बादल के कब्जे में रही।S
लंबे समय बाद 2020 में कृषि कानूनों के कारण भाजपा से गठबंधन टूटा। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी बुरी तरह हारी।पार्टी को कुल 3 सीटें मिलीं।2023 में प्रकाश सिंह बादल का निधन हो गया।यही से सुखवीर के बुरे दिन शुरु हो गए।
वर्ष 2024-25 में अकाल तख्त ने सुखबीर बादल को तंखाहिया घोषित किया और इस्तीफा देने का आदेश दिया। कार्यसमिति ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया, जिससे लगभग तीन दशक का बादल परिवार का सीधा नियंत्रण समाप्त हो गया।
बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के फिर से साथ आने की चर्चाओं ने तब जोर पकड़ा था, जब इस साल अगस्त में सुखबीर बादल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी।
पंजाब में विधानसभा की 117 सीटें हैं।पंजाब में कांग्रेस और भाजपा सत्ता हासिल करने के लिए उतावले हैं।आपको बता दूं कि कांग्रेस मार्च 2022 से और भाजपा मार्च 2017 से पंजाब की सत्ता से बाहर है।वर्ष2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर सरकार बनाईथी। कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने (मार्च 2017 से सितंबर 2021)सितंबर 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बने।
वर्ष 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीत लीं थीं भगवंत मान 16 मार्च 2022 को मुख्यमंत्री बने।तब से कांग्रेस सत्ता से बाहर है।विपक्ष में है।कांग्रेस के पास लगभग 16-18 सीटें हैं।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो भाजपा ने पंजाब में कभी अकेले सरकार नहीं बनाई। यह हमेशा शिरोमणि अकाली दल की जूनियर पार्टनर रही।भाजपा शिरोमणि गठबंधन की अंतिम सरकार 2007 से 2017 तक रही।2017 में कांग्रेस सत्ता में आई, फिर 2022 में आम आदमी पार्टी।इस तरह भाजपा 2017 से सत्ता से बाहर है। 2022 में भाजपा को सिर्फ 2 सीटें मिलीं। अब यक्ष प्रश्न ये है कि क्या मोशा का पंजाब में सरकार बनाने का सपना पूरा होगा या नहीं।