पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर अब एक नया विवाद गहराता जा रहा है। एक हालिया शोध रिपोर्ट के अनुसार बंगाल की मतदाता सूची में करीब 1.04 करोड़ अतिरिक्त वोटर दर्ज हैं।
यह आंकड़ा वही है, जिसका दावा बीजेपी पिछले कई महीनों से करती आ रही है—कि एक करोड़ से अधिक ‘फर्जी वोटर’ हटने के बाद राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल जाएगी।
अध्ययन का बड़ा खुलासा
यह अध्ययन “Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts: Study from Electoral Roll Inflation in the Indian State of West Bengal” शीर्षक से अगस्त 2025 में प्रकाशित हुआ था।
इसे एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च (SPJIMR) के फाइनेंस प्रोफेसर विद्धु शेखर और आईआईएम विशाखापत्तनम के प्रोफेसर मिलन कुमार ने तैयार किया है। अध्ययन के अनुसार बंगाल की मतदाता सूची 13.69% तक फूली हुई (inflated) है। यानी 2004 से 2024 के बीच जो जनसंख्या वृद्धि हुई, उसके हिसाब से मतदाता संख्या में इतनी बढ़ोतरी संभव नहीं है।20 वर्षों की जनसांख्यिकीय तस्वीर
रिपोर्ट के मुताबिक 2004 में राज्य में 4.74 करोड़ वोटर थे। 2024 तक इनमें से लगभग 3.74 करोड़ मतदाता जीवित होने चाहिए थे, जबकि करीब 3.01 करोड़ नए मतदाता जुड़ सकते थे। इस आधार पर वैध मतदाताओं की संख्या लगभग 6.57 करोड़ होनी चाहिए थी, जबकि चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों में 7.61 करोड़ वोटर दर्ज हैं। यानि करीब 1.04 करोड़ अतिरिक्त नाम सूची में हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि 2001 और 2011 की जनगणना के आधार पर 17.86 लाख लोगों का स्थायी पलायन (outmigration) पश्चिम बंगाल से हुआ है।
पूर्व नौकरशाहों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी और राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार का कहना है कि फर्जी मतदाताओं की संख्या 1.8 करोड़ तक हो सकती है।
उनके अनुसार, “पिछले 20 वर्षों में बंगाल की जनसंख्या वृद्धि के अनुसार कुल मतदाताओं की संख्या 6 करोड़ से अधिक नहीं होनी चाहिए, जबकि वर्तमान में यह 7.62 करोड़ है — जो संदिग्ध है।”
राजनीतिक मतभेद और विरोध
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चेतावनी दी है कि “अगर एक भी असली मतदाता का नाम सूची से हटाया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।”
उनका कहना है कि बीजेपी इस प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है। दूसरी ओर बीजेपी का दावा है कि “जब ये 1 करोड़ फर्जी वोटर हटा दिए जाएंगे, तब तृणमूल का सत्ता में रहना मुश्किल हो जाएगा।”
सीपीएम ने भी जादवपुर क्षेत्र में एक नमूना सर्वे किया और निष्कर्ष निकाला कि “राज्य में लगभग 1 करोड़ फर्जी मतदाता मौजूद हो सकते हैं।”
विपक्षी मत और तुलनात्मक उदाहरण
कांग्रेस नेता और अर्थशास्त्री प्रसेनजीत बोस इस रिपोर्ट से असहमत हैं।
उनका कहना है, “यह अध्ययन अनुमान और प्रक्षेपणों पर आधारित है, जो वास्तविक जमीन से मेल नहीं खाते।”
उन्होंने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां SIR प्रक्रिया के दौरान केवल 3% मृत मतदाता पाए गए थे और कुल डिलीशन 8% हुआ था।
“बंगाल में मतदाता संख्या घटने की संभावना बिहार से अधिक नहीं है,” उन्होंने कहा।
राजनीतिक माहौल और आगे की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषक सुभमय मैत्रा का कहना है, “बंगाल में SIR प्रक्रिया पूरी तरह टकराव के माहौल में की जा रही है। जबकि निष्पक्ष और त्रुटि-रहित मतदाता सूची ही लोकतंत्र की नींव है। नागरिक चाहे मतदान करें या नहीं, लेकिन गैर-नागरिक का वोट डालना अस्वीकार्य है।”
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को इस कार्य के लिए बेहतर तैयारी करनी चाहिए थी, खासकर ऐसे माहौल में जब हर दल इसे अपनी सियासत से जोड़ रहा है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का उद्देश्य बंगाल की मतदाता सूची को साफ और सटीक बनाना है, लेकिन इसके परिणाम पर राज्य की राजनीति का भविष्य टिका हुआ है।
एक ओर जहाँ बीजेपी को उम्मीद है कि “फर्जी वोटर हटने से लोकतंत्र शुद्ध होगा”, वहीं तृणमूल का डर है कि “वैध मतदाताओं को भी मिटा दिया जाएगा।”