सीजेआई के खिलाफ कैंपेन पर 44 पूर्व जजों की कड़ी आपत्ति

रोहिंग्या टिप्पणी को लेकर चल रहे प्रेरित अभियान की पूर्व न्यायाधीशों ने निंदा की

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  • रोहिंग्या टिप्पणी मामले में सीजेआई के खिलाफ चल रहे अभियान पर 44 पूर्व जजों ने नाराजगी जताई।
  • पूर्व न्यायाधीशों ने कहा— न्यायपालिका को निशाना बनाने का यह प्रयास अनुचित है।
  • कोर्ट की टिप्पणी को गलत संदर्भ में पेश करने पर आपत्ति दर्ज की।
  • रोहिंग्या की कानूनी स्थिति, दस्तावेज धोखाधड़ी और एसआईटी जांच की जरूरत पर भी बात कही।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 12 दिसंबर: देश के 44 पूर्व सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ चल रहे कथित ‘मोटिवेटेड कैंपेन’ पर कड़ी नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि रोहिंग्या प्रवासियों को लेकर की गई कोर्ट की सामान्य पूछताछ को जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।

पूर्व जजों ने 5 दिसंबर को जारी ओपन लेटर में लिखा कि यह अभियान सुप्रीम कोर्ट की साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है। उन्होंने साफ कहा कि 2 दिसंबर की सुनवाई में CJI ने सिर्फ यह पूछा था कि रोहिंग्या किस कानूनी अधिकार या दर्जे का दावा कर रहे हैं। इसे अमानवीय टिप्पणी बताना गलत है।

पूर्व जजों ने याद दिलाया कि भारत में किसी भी व्यक्ति नागरिक या विदेशी के साथ अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह सिद्धांत दोहराया था। इसके बावजूद कोर्ट को ही अमानवीय बताना एक गंभीर विकृति है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून के अनुसार रोहिंग्या को शरणार्थी का दर्जा प्राप्त नहीं है। अधिकतर मामलों में उनकी भारत में एंट्री अनियमित या अवैध पाई गई है। भारत 1951 शरणार्थी सम्मेलन और 1967 प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है, इसलिए कोई भी व्यक्ति केवल दावा करके शरणार्थी नहीं बन जाता।

पूर्व न्यायाधीशों ने आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेज अवैध रूप से मिलने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इससे पहचान प्रणाली की विश्वसनीयता कमजोर होती है और संगठित नेटवर्क की आशंका बढ़ती है।

उन्होंने ऐसे मामलों की जांच के लिए कोर्ट-नियंत्रित विशेष जांच दल (SIT) बनाने की जरूरत बताई। SIT यह जांच करेगी कि अवैध प्रवासियों को दस्तावेज कैसे मिले और किन अधिकारियों या बिचौलियों की भूमिका रही।

पूर्व जजों ने कहा कि म्यांमार में रोहिंग्या की नागरिकता स्थिति पहले से विवादित है। ऐसे में भारतीय अदालत को राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि कानूनी प्रावधानों और संवैधानिक सीमाओं के आधार पर फैसला लेना होता है।

उन्होंने जोर दिया कि भारत का संवैधानिक ढांचा मानवता और राष्ट्रीय सुरक्षा—दोनों की मांग करता है। न्यायपालिका इन दोनों सिद्धांतों की रक्षा कर रही है। इसे समर्थन मिलना चाहिए, न कि नकारात्मक प्रचार।

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