पूनम शर्मा
आर्यभट्ट (476-550 ई.) भारत के ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने अपनी वैज्ञानिक सोच से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्हें अक्सर निकोलस कॉपरनिकस से पहले के वैज्ञानिक के रूप में याद किया जाता है। उनकी जीवनी भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग से जुड़ी है, जो गुप्त साम्राज्य के अंतिम चरण में था।
आर्यभट्ट ने मात्र 23 वर्ष की उम्र में संस्कृत में ‘आर्यभटीय’ नामक एक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखा, जो आधुनिक खगोलशास्त्र और गणित का मूल आधार बना। इस ग्रंथ के सिद्धांत बाद में अरब और यूरोप के वैज्ञानिकों तक पहुंचे और आधुनिक विज्ञान की नींव बने।
उस समय जब दुनिया मानती थी कि पृथ्वी स्थिर है और आकाश मंडल घूमता है, आर्यभट्ट ने कहा कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। उन्होंने एक आसान उदाहरण दिया कि जैसे एक नाव में बैठा व्यक्ति बाहर के स्थिर पेड़ों को पीछे सरकता हुआ देखता है, वैसे ही पृथ्वी के घूमने से आकाश के तारे गतिशील प्रतीत होते हैं।
आर्यभट्ट ने सूर्य और चंद्र ग्रहणों की भी वैज्ञानिक व्याख्या की। उन्होंने कहा कि चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और सूर्य ग्रहण तब जब चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है। इसके अलावा, उन्होंने ग्रहों के अपने प्रकाश न होने और सूर्य के प्रकाश के प्रतिबिंब होने का भी प्रमाण दिया।
उन्होंने नक्षत्रीय वर्ष की लंबाई 365.258 दिन बताई, जो आधुनिक मान से लगभग मेल खाती है। इसके साथ ही, पृथ्वी की परिधि लगभग 39,968 किलोमीटर बताई, जो आज के आधिकारिक आंकड़े के बेहद करीब है। गणित में π के मान को भी उन्होंने 3.1416 के करीब सटीक बताया।
हालांकि, उस समय के धार्मिक और सामाजिक विश्वासों के कारण, आर्यभट्ट की इन वैज्ञानिक धारणाओं का कड़ा विरोध हुआ। महान गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य ने उनकी बातों को अस्वीकार किया और धर्मशास्त्र के आधार पर पृथ्वी को स्थिर मानने की कोशिश की। लेकिन यह विरोध आर्यभट्ट के सिद्धांतों के महत्व को कम नहीं कर पाया।
वास्तव में, उनके सिद्धांतों को बाद में अरब वैज्ञानिकों ने अपनाया और यूरोप में पुनर्जागरण के लिए आधार प्रदान किया। इसलिए, आर्यभट्ट न केवल भारत बल्कि विश्व विज्ञान के इतिहास में एक महान क्रांतिकारी थे।