लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने सभी दलों के नेताओं से राष्ट्र हित में सदन की कार्यवाही बाधित नहीं करने की भावुक अपील !
डॉ. कुमार राकेश
नई दिल्ली, 10 अगस्त : संसद में बार-बार होने वाले व्यवधानों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लोकतंत्र तब भी लोगों की सेवा कर सकता है जब संसद ही न चले। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सभी दलों के नेताओं से भावुक अपील की कि वे संसद को उसका संवैधानिक दायित्व निभाने दें। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि प्रश्नकाल आयोजित हो, कानूनों पर बहस हो, और संसद का मंच रचनात्मक चर्चा का केंद्र बने रहना चाहिए। अध्यक्ष ने यह भी याद दिलाया कि आम नागरिकों की समस्याएं संसद के बाहर नहीं रहनी चाहिए; उनकी आवाज़ सदन में सुनी और संबोधित होनी चाहिए।
हर घंटे का व्यवधान जनता के कल्याण, विधायी जाँच और जवाबदेही के समय की हानि है। रोजगार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सार्थक बहस जरूरी है, लेकिन राजनीतिक रणनीतियों के चलते ये विषय पीछे छूट रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, विपक्ष के कुछ वर्ग राजनीतिक टकराव को संसद की बहस से ऊपर रख रहे हैं, जिससे विकास से जुड़े मुद्दे दरकिनार हो रहे हैं। कुछ विपक्षी सांसद मौजूदा नेतृत्व और शैली से निजी तौर पर असहज हैं, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति दोनों ने संसद में बढ़ते व्यवधानों और गिरते स्तर पर चिंता जताई है।अध्यक्ष ने याद दिलाया कि आम नागरिकों की समस्याएं संसद के बाहर नहीं छूटनी चाहिए—उनकी आवाज़ सदन में सुनी और संबोधित होनी चाहिए स्वस्थ असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन विपक्ष का कर्तव्य है कि वह संसद को मज़बूत बनाए, न कि उसे अक्षम कर दे। भारतीय जनता सांसदों को इसलिए चुनती है ताकि वे जनता की समस्याएँ उठाएं, सरकार से सवाल करें और कानून पारित करें—न कि संसद को अनिश्चितकाल तक ठप रखने के लिए। लोकतंत्र संवाद, जवाबदेही और भागीदारी से ही फलता-फूलता है। देश को अपेक्षा है कि संसद में बहस, विचार-विमर्श और निर्णय देशहित में हों, न कि केवल व्यवधान और टकराव के लिए ।
लोकतंत्र संवाद, जवाबदेही और भागीदारी से फलता-फूलता है। देश को अपेक्षा है कि संसद में बहस, विचार-विमर्श और निर्णय देशहित में हों, न कि केवल व्यवधान और टकराव के लिए।