समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 20 अगस्त :सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को गुजरात के दो सरकारी कर्मचारियों को 30 साल पुराने 20 रुपये रिश्वत केस में बरी कर दिया। 1996 में दर्ज मामले में आरोप था कि ग्राम पंचायत के तलाठी-कम-मंत्री और उसके अधीन काम करने वाले चपरासी ने एक छात्र से इनकम सर्टिफिकेट के एवज में 120 रुपये की रिश्वत मांगी थी।
शिकायत के मुताबिक, मंत्री ने 100 रुपये और चपरासी ने 20 रुपये मांगे थे। छात्र ने एंटी करप्शन ब्यूरो की मदद ली, जिनके साथ मिलकर वह 120 रुपये के चिन्हित नोट लेकर गया। छापा मारने पर चपरासी के पास 20 रुपये बरामद हुए, जबकि मंत्री के पास से 100 रुपये नहीं मिले।
मुकदमे में ट्रायल कोर्ट ने 1999 में दोनों को दोषी ठहराया था और हाई कोर्ट ने भी 2015 में सजा बरकरार रखी थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कर्मचारियों ने तर्क दिया कि रिश्वत की मांग साबित नहीं हुई और चपरासी ने कभी पैसे की डिमांड नहीं की। अदालत ने पाया कि छात्र ने अलग-अलग मामलों में मांग को लेकर विरोधाभासी बयान दिए और पुलिस की जांच में भी कई अनियमितताएं थीं।
जस्टिस उज्जल भुयान और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि केवल 20 रुपये की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक कि मांग साबित न हो। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी ने पैसे ईद के त्योहार के उपलक्ष्य में लिए हो सकते हैं, जैसा उसका बचाव था। कोर्ट ने अभियोजन की मंजूरी को भी अमान्य करार दिया क्योंकि वह सक्षम अधिकारी द्वारा नहीं दी गई थी।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया और तीन दशक पुराना मामला समाप्त कर दिया।