अमरीश मनीष शुक्ल
पुणे के मंच पर खड़े होकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूरे आत्मविश्वास से माइक संभाला और मनुस्मृति पर तीखा प्रहार करते हुए कहा—”मनुस्मृति में लिखा है कि स्त्री बाल्यावस्था में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के अधीन रहती है… ये शब्द शर्मनाक हैं। महिलाएं किसी की संपत्ति नहीं हैं, उनका अपना स्वतंत्र वजूद है और उन्हें पिंजरा तोड़ना होगा।”
भाषण पर तालियां बजीं, क्लिप्स वायरल हुईं। लेकिन ज़रा ठहरिए…
क्या आपको पता है कि जिस अखंड ज्ञान और न्याय-संहिता पर राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच से सवाल उठा दिया, उसकी मूल संस्कृत पांडुलिपि को उन्होंने जीवन में कभी खोलकर पढ़ा तक नहीं होगा—उसके व्याकरण, मीमांसा और संदर्भ को समझना तो बहुत दूर की बात है?
जिस औपनिवेशिक झूठ और अंग्रेजों द्वारा गढ़ी गई मैकालेवादी विकृति को राहुल गांधी ‘आधुनिक क्रांति’ समझकर दोहरा रहे हैं, वह असल में स्त्री के अधिकार छीनने का नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए समाज और परिवार से भागने का हर ‘एस्केप रूट’ हमेशा के लिए सील करने वाला दुनिया का सबसे कठोर सुरक्षा कानून था!
और सबसे बड़ा ऐतिहासिक रहस्य—जिस विधान को राजनीतिक रैलियों में ‘कैद’ बताया गया, उसी मनुस्मृति ने सहस्राब्दियों पूर्व स्त्री को ‘स्त्रीधन’ के रूप में ऐसी पूर्ण आर्थिक संप्रभुता दे रखी थी जिसे छूने का साहस पति, पिता या पुत्र का कानूनन कभी नहीं हो सकता था।
यदि आप भी अब तक इस राजनीतिक दुष्प्रचार और औपनिवेशिक अनुवाद को सच मानते आए हैं, तो अगले कुछ मिनट आपकी सोच की नींव हिला देंगे। आइए, प्रयाग फाइल्स में आज अज्ञानता के उस राजनीतिक चश्मे को उतारते हैं और भारतीय दर्शन के उस वैज्ञानिक सुरक्षा चक्र को डिकोड करते हैं जिसे आपसे जानबूझकर छिपाया गया…
वह श्लोक जिस पर राजनीतिक रोटियां सेकी गईं
मनुस्मृति (अध्याय 9, श्लोक 3) का मूल पाठ है:
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥
राजनीतिक मंचों, औपनिवेशिक प्राच्यविदों और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा इसका जो विकृत अर्थ प्रचारित किया गया, वह कुछ इस प्रकार है:
“स्त्री की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं; अर्थात् वह जीवन भर पुरुषों के अधीन रहती है और उसे अधीन ही रहना चाहिए, क्योंकि वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं है।”
यह व्याख्या न केवल संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से अक्षम्य भूल है, बल्कि यह सनातन न्यायशास्त्र की मूल आत्मा पर किया गया वैचारिक आघात है। जब हम इस श्लोक को ‘तुच्छ चुनावी राजनीति’ के संकीर्ण चश्मे से मुक्त कर ‘पारिवारिक उत्तरदायित्व’, ‘विकासात्मक मनोविज्ञान’ और ‘विकेंद्रीकृत सुरक्षा व्यवस्था’ के गणितीय मॉडल से समझते हैं, तो पूरा नैरेटिव ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।
1. भाषा विज्ञान और मीमांसा: ‘रक्ष’ धातु और ‘अ-स्वातन्त्र्य’ का वास्तविक मर्म
संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि चेतना और विधि-विधान का परिशुद्ध विज्ञान है। इसमें प्रयुक्त एक-एक धातु का अपना निश्चित और अकाट्य अर्थ होता है:
‘रक्ष’ धातु बनाम शासन या दमन: श्लोक में मुख्य क्रियापद ‘रक्षति’ (सुरक्षा, पोषण और संवर्धन करना) है। पूरे श्लोक में कहीं भी ‘शास्ति’ (शासन करना), ‘दण्डयति’ (नियंत्रित करना) या ‘अधीनं करोति’ (गुलाम बनाना) जैसे शब्दों का लेशमात्र भी प्रयोग नहीं है। यह विधान स्त्री पर कोई अंकुश नहीं लगाता, बल्कि पुरुष पर एक अहस्तांतरणीय (Non-transferable) सुरक्षा दायित्व आरोपित करता है।
‘न स्वातन्त्र्यमर्हति’ का प्रामाणिक अर्थ: विधि साहित्य और न्यायशास्त्र की मीमांसा के अनुसार, ‘अ-स्वातन्त्र्य’ का अर्थ अधिकारों का हरण या जेल नहीं, बल्कि ‘निराश्रित या लावारिस न छोड़ना’ (Not to be left unattended or vulnerable) है। ‘अनर्हता’ (Unworthiness) का भाव स्त्री की क्षमता के प्रति नहीं, बल्कि उस ‘परिस्थिति’ के प्रति सख्त निषेध (Strict Prohibition) है जहाँ वह संकट में अकेली छूट जाए।
अमूल्य निधि का सिद्धांत: जिस प्रकार किसी अत्यंत बहुमूल्य धरोहर, राष्ट्र की सर्वोच्च संपदा या सामरिक सुरक्षा तकनीकों को कभी भी असुरक्षित या खुला नहीं छोड़ा जाता, ठीक उसी प्रकार समाज की मूल जीवनदायिनी शक्ति—स्त्री—को असुरक्षित छोड़ना अक्षम्य सामाजिक अपराध माना गया।
2. 1794 का औपनिवेशिक षड्यंत्र: ब्रिटिश ‘कवरचर कानून’ का घालमेल
इस श्लोक को विकृत करने की जड़ें 18वीं सदी के औपनिवेशिक काल में हैं, जिसे आज के राजनेता बिना सोचे-समझे दोहराते हैं। 1794 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी सर विलियम जोन्स ने जब मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद (Institutes of Hindu Law) तैयार किया, तो उन्होंने इसे तत्कालीन ब्रिटिश ‘डॉक्ट्रिन ऑफ कवरचर’ (Doctrine of Coverture) के चश्मे से देखा।
कवरचर कानून क्या था? उस समय ब्रिटेन के कानून के तहत एक विवाहित महिला की अपनी कोई स्वतंत्र कानूनी या नागरिक पहचान नहीं होती थी। विवाह के बाद स्त्री की संपत्ति, उसके कानूनी अधिकार और उसका अस्तित्व पूरी तरह उसके पति की संपत्ति मान लिया जाता था।
विकृति का रोपण: अंग्रेजों ने अपने समाज की इस पितृसत्तात्मक कुरीति को मनुस्मृति के सुरक्षात्मक विधान पर जबरन थोप दिया। उन्होंने ‘रक्षण’ (Protection) का अनुवाद ‘कस्टडी’ (Custody/Subjection) के रूप में किया और भारत की अगली पीढ़ियों में यह हीनभावना भर दी कि उनका अपना शास्त्र स्त्री-विरोधी है।
3. ‘स्त्रीधन’ और वित्तीय प्रबंधन: क्या कोई गुलाम आर्थिक रूप से संप्रभु हो सकता है?
यदि मनुस्मृति की मंशा स्त्री को पुरुष का ‘गुलाम’ या ‘अधीनस्थ’ बनाने की होती, तो उसी ग्रंथ में स्त्री को वह आर्थिक संप्रभुता कभी न दी जाती जो 19वीं सदी के अंत तक पश्चिमी देशों में अकल्पनीय थी।
मनुस्मृति (अध्याय 9, श्लोक 194) में ‘स्त्रीधन’ की स्पष्ट व्यवस्था है:
अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तं च प्रीतिकर्मणि।
भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम्॥
विवाह, उपहार, पिता, माता या भाइयों से प्राप्त समस्त चल-अचल संपत्ति पर केवल और केवल स्त्री का अनन्य स्वामित्व घोषित किया गया।
शास्त्रों ने यह कठोर नियम बनाया कि कोई भी पति, पुत्र या सगा-संबंधी स्त्री की अनुमति के बिना उसके ‘स्त्रीधन’ को हाथ भी नहीं लगा सकता था। यदि पति संकट काल में भी उसका उपयोग करता, तो उसे ब्याज सहित लौटाने का विधान था।
गृह-अर्थव्यवस्था की स्वामिनी: मनुस्मृति (9.11) में घर के संपूर्ण आय-व्यय, बजट और वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन सीधे स्त्री के अधिकार क्षेत्र में सौंपा गया (अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत्)।
पुत्री को पुत्र के समान अधिकार: मनुस्मृति (9.130) में यह स्पष्ट आदेश है कि पुत्र न होने पर पुत्री ही पिता की संपूर्ण संपत्ति की स्वाभाविक उत्तराधिकारी बनेगी—”यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा” (जैसे अपनी आत्मा है वैसा पुत्र है, और पुत्र के समान ही पुत्री है)।
…ज़रा ठहरिए! यहाँ एक गहरा सस्पेंस और तार्किक पहेली छिपी है—
यदि यह श्लोक वाकई स्त्री को ‘कमजोर’ और ‘अधीन’ बनाने के लिए लिखा गया था, तो फिर इसी कानून ने पुरुष को जीवन भर उस स्त्री के भरण-पोषण और सुरक्षा का ‘बंधक’ क्यों बना दिया? क्यों किसी भी पुरुष को अपनी जिम्मेदारी से एक कदम भी पीछे हटने या पलायन करने की छूट नहीं दी गई? असली रहस्य यहीं खुलता है…
4. पुरुषों के पलायन (Escapism) पर पूर्ण निषेध: जीवन-पर्यंत सामाजिक बीमा
आधुनिक सभ्यताओं में जब कानून ‘गुजारा भत्ता’ (Right to Maintenance) या पारिवारिक दायित्वों के लिए अदालतों के चक्कर लगवाता है, मनुस्मृति का यह विधान सहस्राब्दियों पूर्व एक स्वचलित (Automated) सुरक्षा तंत्र स्थापित कर चुका था।
यह श्लोक पुरुषों के ‘पलायन मार्ग’ (Escape Routes) को पूर्णतः अवरुद्ध करता है:
बाल्यावस्था: पिता अपनी पुत्री को दायित्वहीन होकर त्याग नहीं सकता; उसके पोषण, सुरक्षा और विद्या का पूर्ण भार पिता पर है।
युवावस्था: पति अपनी पत्नी को विपदा या वैचारिक मतभेद के नाम पर मझधार में नहीं छोड़ सकता; उसके सम्मान और भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति के कंधों पर है।
वृद्धावस्था: पुत्र अपनी वृद्ध माता को उपेक्षित करके वृद्धाश्रम की ओर नहीं धकेल सकता; माता की सेवा पुत्र का अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य है।
प्राचीन काल में जब राज्य प्रायोजित पेंशन योजनाएँ, समाज कल्याण विभाग या वृद्धाश्रम नहीं थे, तब यह श्लोक एक ‘लाइफ-टाइम सोशल सिक्योरिटी गारंटी’ था। यह कानून स्त्री की स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों पर उत्तरदायित्व का नैतिक, आर्थिक और सामाजिक हंटर चलाने के लिए रचा गया था।
5. मातृत्व का सर्वोच्च गौरव: पिता से 1000 गुना श्रेष्ठ
जो लोग मनुस्मृति को पुरुष-प्रधान अहंकार का ग्रंथ कहते हैं, उन्हें उसी ग्रंथ का यह सार्वभौमिक सिद्धांत पढ़ना चाहिए:
उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेणातिरिच्यते॥ (मनुस्मृति 2.145)
अर्थात्—दस उपाध्यायों से बड़ा एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों से बड़ा एक पिता होता है, लेकिन एक हजार पिताओं से भी अधिक गौरवशाली और पूजनीय एक ‘माता’ होती है!
जिस विधान ने सामाजिक और आध्यात्मिक पदानुक्रम (Hierarchy) में माता को पिता से हजार गुना ऊंचा स्थान दिया हो, उस पर स्त्री के दमन का लांछन लगाना केवल वैचारिक अंधापन है।
6. पुलिस तंत्र के अभाव में सुरक्षा की प्राथमिक इकाई: विकेंद्रीकृत कानून व्यवस्था
ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय धरातल पर देखें तो प्राचीन और मध्यकालीन युग में आज की तरह आधुनिक राज्य पुलिस बल, 112 आपातकालीन सेवा, त्वरित गश्ती दल या सीसीटीवी निगरानी तंत्र मौजूद नहीं थे।
राज्य की सेनाएं केवल बाह्य सीमाओं और राजकाज की रक्षा करती थीं।
समाज के भीतर बाहरी अपराधियों, आक्रांताओं और असामाजिक तत्वों से नागरिकों की रक्षा का सबसे पहला और प्रभावी सुरक्षा घेरा ‘पारिवारिक संरचना’ ही थी।
इसलिए शास्त्रकारों ने स्त्री की सुरक्षा को अमूर्त व्यवस्था के भरोसे छोड़ने के बजाय, उसके सबसे निकटतम पुरुषों—पिता, पति और पुत्र—पर कानूनी और धार्मिक रूप से अनिवार्य कर दिया। यह आधुनिक विकेंद्रीकृत सुरक्षा रणनीति (Decentralized Defense Strategy) का उत्कृष्ट ऐतिहासिक प्रमाण था।
7. वैदिक पृष्ठभूमि और विदुषियों की ऐतिहासिक परंपरा
जो लोग इस श्लोक को अज्ञानतावश स्त्रियों को अनपढ़ या घरों में बंद रखने का फरमान मानते हैं, वे सनातन इतिहास की उस गौरवमयी परंपरा से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं जहाँ स्त्रियाँ ज्ञान और दर्शन के सर्वोच्च शिखर पर थीं:
वैदिक ऋषि और मंत्र-दृष्टा: ऋग्वेद में अपाला, लोपामुद्रा, घोषा और विश्ववारा जैसी विदुषियों ने वेदमंत्रों की रचना की। उन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ का पद प्राप्त था।
शास्त्रार्थ की अधिष्ठात्री: राजा जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य से दार्शनिक शास्त्रार्थ करने वाली गार्गी वाचक्नवी और आत्मज्ञान की मीमांसा करने वाली मैत्रेयी उसी सनातन समाज की उपज थीं।
जिस सभ्यता में स्त्री को ‘ऋषि’ और ‘ब्रह्मवादिनी’ के रूप में पूजा गया हो, क्या वहाँ सुरक्षा के एक नियम को ‘बौद्धिक या सामाजिक कैद’ माना जा सकता है? यह आरोप केवल ऐतिहासिक अज्ञानता का परिणाम है।
8. भौतिकी, जीवविज्ञान और प्रकृति का रूपक: सुरक्षा आवरण बनाम पराधीनता
विज्ञान और प्रकृति के सार्वभौमिक नियम इस व्यवस्था की तार्किकता को और अधिक पुष्ट करते हैं:
ओजोन परत और भू-चुंबकीय क्षेत्र: पृथ्वी को सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों और अंतरिक्षीय सौर तूफानों से बचाने के लिए प्रकृति ने ‘ओजोन परत’ और ‘भू-चुंबकीय क्षेत्र’ (Magnetic Field) का रक्षा कवच प्रदान किया है। क्या कोई विवेकशील वैज्ञानिक यह कहेगा कि पृथ्वी ओजोन परत की ‘गुलाम’ है? कदापि नहीं। वह सुरक्षा आवरण ही पृथ्वी पर जीवन और जैव-विविधता को फलने-फूलने का अवसर देता है।
ऊर्जा और विद्युत का संवहन: भौतिक विज्ञान में विद्युत (Electricity) अपार शक्ति का स्रोत है, किंतु उसे सुरक्षित और प्रभावी बनाए रखने के लिए उपयुक्त ‘इंसुलेशन’ (Insulation) और ‘कंडक्टर’ अनिवार्य होते हैं। भारतीय दर्शन में स्त्री मूल ‘पराशक्ति’ है। पिता, पति और पुत्र उस शक्ति के लिए वह बाह्य सुरक्षा कवच निर्मित करते हैं, जिससे वह बाह्यसंघर्षों की क्रूरता से मुक्त होकर अपनी बौद्धिक, आध्यात्मिक और सृजनात्मक मेधा को उच्चतम स्तर तक पहुंचा सके।
बीज और भूमि का सिद्धांत: एक बीज को अंकुरित होने के लिए मिट्टी का आवरण चाहिए होता है। वह मिट्टी का दबाव बीज को नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उसे विशाल वटवृक्ष बनने तक पोषण और संरक्षण देने के लिए होता है।
9. आधुनिक विकासात्मक मनोविज्ञान और ‘सेंस ऑफ सिक्योरिटी’
विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology) और मानव व्यवहार विज्ञान स्पष्ट करता है कि मानव मस्तिष्क अपनी अधिकतम क्षमता (Optimal Potential) का प्रदर्शन केवल तभी कर पाता है जब वह ‘सेंस ऑफ सिक्योरिटी’ (सुरक्षा के आंतरिक बोध) से पूरी तरह आश्वस्त हो।
जब एक कन्या को यह अटल विश्वास होता है कि उसके पीछे उसके पिता का अडिग संबल है, तो उसका आत्मबल समाज की हर चुनौती से टकराने को तैयार रहता है।
जब एक गृहिणी या पेशेवर स्त्री को यह निश्चितता होती है कि जीवन के पथ पर उसका पति एक ढाल बनकर खड़ा है, तो वह मानसिक तनावों से मुक्त होकर अपने लक्ष्यों को साधती है।
जब एक माता को यह भरोसा होता है कि उसका पुत्र सेवा और सम्मान के लिए तत्पर है, तो उसका बुढ़ापा गरिमामय और निश्चिंत बनता है।
यह मनोवैज्ञानिक भरोसा कि “तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं”—किसी भी व्यक्ति को निर्भय बनाने का सबसे शक्तिशाली आधार है। संरक्षण कभी बेड़ियां नहीं बनता; संरक्षण ही वह नींव है जिस पर स्वाभिमान और स्वावलंबन का भवन खड़ा होता है।
किसी भी ग्रंथ के एक श्लोक को उसके व्यापक दर्शन से अलग करके देखना बौद्धिक बेईमानी है। मनुस्मृति का यह विधान उसी ग्रंथ का अभिन्न अंग है जहाँ यह स्पष्ट रूप से अंकित है:
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ (मनुस्मृति 3.56)
(जहाँ नारियों का आदर और सत्कार होता है, वहीं देवत्व फलीभूत होता है; और जहाँ इनका अनादर होता है, वहाँ समस्त बड़े से बड़े कार्य निष्फल हो जाते हैं।)
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा॥ (मनुस्मृति 3.57)
(जिस कुल में स्त्रियाँ पीड़ित या उपेक्षित रहती हैं, उस कुल का शीघ्रातिशीघ्र समूल विनाश हो जाता है।)
जिस ग्रंथ में नारी के दुख को समूचे कुल के विनाश का कारण और उसके सम्मान को समाज की प्रगति की अनिवार्य शर्त घोषित किया गया हो, वहाँ उसे पराधीन करने का आशय खोजना केवल वैचारिक दुराग्रह और चुनावी प्रोपेगैंडा है। सुरक्षा का यह ढांचा उसी सम्मान और आदर को व्यावहारिक धरातल पर क्रियान्वित करने का रक्षा कवच है।
आज का पश्चिमी और आधुनिक विमर्श केवल ‘अधिकारों’ (Rights) के अंतहीन टकराव पर टिका है, जिसके परिणामस्वरूप पारिवारिक ताना-बाना बिखर रहा है, वृद्ध माता-पिता अकेलेपन के शिकार हो रहे हैं और समाज में असुरक्षा की भावना गहरी हो रही है।
सनातन भारतीय दृष्टि ‘कर्तव्य’ (Duty) और ‘जवाबदेही’ को केंद्र में रखती है। जब समाज का प्रत्येक पुरुष यह स्वीकार करता है कि अपनी पुत्री, पत्नी और माता की सुरक्षा, संवर्धन और सम्मान उसकी सर्वोच्च नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है, तब किसी भी नारी को भयभीत या असुरक्षित होने की आवश्यकता नहीं रहती। यह श्लोक स्त्री के पंख काटने का फरमान नहीं, बल्कि उसके आकाश को हिंसक आपदाओं और शिकारियों से मुक्त रखने का घोषणापत्र है।
जाते-जाते एक मैं यानी अमरीश मनीष शुक्ल आपसे बस यही कहना चाहूंगा कि…
ज़रा अपनी आंखें बंद कीजिए और सोचिए—अगर आज का हर पिता अपनी बेटी की अभेद्य ढाल बन जाए, हर पति अपनी पत्नी का अडिग संबल बन जाए और हर बेटा अपनी वृद्ध माँ का सर्वोच्च स्वाभिमान बन जाए, तो क्या इस देश में किसी निर्भया को न्याय के लिए चीखना पड़ेगा? क्या हमारे समाज को किसी वृद्धाश्रम की चौखट तैयार करनी पड़ेगी?
सनातन ने हजारों साल पहले जिस पारिवारिक सुरक्षा तंत्र को रचा था, आज राजनीतिक अज्ञानता के कारण हम उसी की उपेक्षा करके असुरक्षा और अवसाद की आग में झुलस रहे हैं। अगली बार जब कोई नेता या औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति इस श्लोक को ‘गुलामी’ कहे, तो उससे पूरे स्वाभिमान से पूछिएगा—”क्या सूर्य को अपनी कक्षा में थामने वाला गुरुत्वाकर्षण उसकी बेड़ी है, या पूरे सौरमंडल को जीवन और संतुलन देने वाला शाश्वत नियम?”
“सुरक्षा को पराधीनता समझना बौद्धिक अंधापन है; क्योंकि जिसे राजनीतिक अज्ञानता ‘अधीनता’ कहकर बदनाम करती है, सनातन न्यायशास्त्र उसे स्त्री का ‘अनन्य अधिकार’ और पुरुष का ‘अनिवार्य धर्म’ घोषित करता है!”
..
— अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज