विजय पाल सिंह
हाल ही में वकीलों और पुलिस के बीच हुए टकराव ने हमारी राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक व्यवस्था की एक स्याह तस्वीर पेश की है।
वकीलों द्वारा पुलिस को बैकफुट पर धकेलने, एसएचओ से हाथापाई और मुकदमे वापस लेने के दबाव ने पुलिस महकमे में ऐसा रोष पैदा किया कि 2 नवंबर को सैकड़ों पुलिसकर्मी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए।
पुलिस विभाग और सरकार ने पुलिस के दर्द को नापने के बजाय उस एसीपी को निलंबित करना पसंद किया जो इस प्रदर्शन के केंद्र में था। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ हो नहीं सकता कि सरकारें अपने कर्मचारियों की समस्याओं को समझने के बजाय उन्हें सजा देकर चुप कराने का रास्ता अपनाएं।
दुर्भाग्य से, इस प्रदर्शन में कुछ पुलिसकर्मियों ने अपशब्दों का प्रयोग भी किया, जो कभी नहीं होना चाहिए था। एक तो प्रदर्शन, जिसकी पुलिस विभाग में कोई गुंजाइश ही नहीं है और दूसरे कुछ अपशब्दों का प्रयोग, इन दो गलतियों ने पूरे घटनाक्रम का नैरेटिव ही पलट दिया। पुलिस की बेबसी, उनका दर्द और उनके असली सवाल नेपथ्य में चले गए और चर्चा का केंद्र सिर्फ उनकी ‘अनुशासनहीनता’ बन गई।
सिस्टम का अनाथपन और मूकदर्शक सरकार
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चुभने वाला सच यह है कि संकट के समय पुलिस हर मोर्चे पर अकेली और ‘अनाथ’ नजर आई। न तो पुलिस विभाग का शीर्ष नेतृत्व उनके साथ खड़ा था, न सरकार, और न ही वे सेवानिवृत्त अफसर जो अपने अनुभवों से सिस्टम को दिशा दे सकते हैं।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे जूनियर अफसरों के लिए आज तक कोई स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) नहीं है कि जब अदालत और थाने के बीच ऐसा टकराव हो, तो उन्हें कैसे पेश आना है।
दूसरी ओर, व्यवस्था के दोहरे मापदंड साफ नजर आते हैं। जब अदालत परिसर में अनुशासनहीनता होती है या हड़ताल से अदालती काम ठप हो जाता है, तो उस पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती। लेकिन थाने के भीतर हुई एक घटना पर पुलिस को हिला दिया जाता है। प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों पर तो निलंबन की गाज गिर जाती है, लेकिन थाने में घुसकर हाथापाई करने वालों पर सरकारें मौन साध लेती हैं।
क्या बेबस खाकी से देश चलेगा?
यह असंतुलन कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या एक डरी हुई और बिना मनोबल वाली पुलिस व्यवस्था से कानून का राज स्थापित किया जा सकता है? क्या ‘काले कोट’ के विशेषाधिकार के नाम पर किसी संघ को यह तय करने की छूट दी जा सकती है कि थाने में किसे गिरफ्तार किया जाए और किसे छोड़ा जाए? वकील की वकालत थानों में हो या अदालतों में?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे जाएंगे, पुलिस थानों में बेबस नजर आती रहेगी।
वकीलों के पास ‘बार एसोसिएशन’ जैसी मजबूत ढाल है। अगर एक कोर्ट के वकील यह कह रहे हैं कि एसीपी शाहदरा ने उन्हें पिस्टल दिखाई तो पूरी बार बोल रही है कि उन्हें पिस्टल दिखाई। उस घटना के वीडियो की सच्चाई को देखकर भी हर कोई अनदेखा कर रहा है। बार, मीडिया, सरकार या पुलिस विभाग की सीनियर हायरार्की कोई भी यह सवाल करने को तैयार नहीं है कि इतने सारे वकील थाने में गए क्यों थे। पुलिस के साथ हाथापाई किस अधिकार से की थी।
जिन कानूनों से वकालत का पेशा संचालित होता है, क्या वह वकीलों को ऐसा करने की इजाजत देता है? जबकि ‘अनुशासन नियमावली’ की बेड़ियों में जकड़ी पुलिस अपनी बात भी मुखरता से नहीं रख सकती।
रणनीतिक बचाव और संस्थागत सुरक्षा की दरकार
ऐसे माहौल में, पुलिस को खुद अपने बचाव के लिए रणनीतिक बदलाव करने होंगे। आज के समय में डिजिटल साक्ष्य ही उनकी सबसे बड़ी ढाल हैं। थानों में सीसीटीवी और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों (विशेषकर कोर्ट परिसर में) के लिए ‘बॉडी कैमरा’ अनिवार्य होना चाहिए। निर्विवाद वीडियो साक्ष्य ही झूठे नैरेटिव को काट सकता है। इसके अलावा, एसएचओ को अपने स्तर पर स्थानीय प्रोटोकॉल तय करने होंगे और किसी भी घटना के तुरंत बाद तथ्यों को जनता के सामने रखना होगा।
पुलिस के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अब एक संस्थागत मंच की जरूरत है। एक अनुशासित बल होने के नाते उन्हें हड़ताल का अधिकार नहीं दिया जा सकता, लेकिन ब्रिटेन की ‘पुलिस फेडरेशन’ की तर्ज पर भारत में भी एक वैधानिक निकाय होना चाहिए। यह फेडरेशन बाहरी दबाव या एकतरफा कार्रवाई के समय पुलिसकर्मियों को स्वतंत्र कानूनी सहायता दे सके और उनके अधिकारों की आधिकारिक पैरवी कर सके।
आत्म-निरीक्षण: खाकी को भी बदलना होगा
इन बाहरी संघर्षों के बीच, पुलिस को यह भी स्वीकार करना होगा कि कई बार वे अपने ही व्यवहार से समस्याएं पैदा कर लेते हैं। आज के दौर में पुलिस की ट्रेनिंग सिर्फ कानूनी धाराओं तक सीमित नहीं रह सकती; उन्हें मानवीय व्यवहार और मनोविज्ञान की सघन ट्रेनिंग देनी होगी।
जिस तरह एक कॉल सेंटर का कर्मचारी विपरीत परिस्थितियों और लाख उकसावे के बावजूद अपना धैर्य नहीं खोता, पुलिस को भी वैसी ही सहनशीलता विकसित करनी होगी। यह भले ही व्यवस्था की हर खामी का इलाज न हो, लेकिन इससे रोजमर्रा की कई समस्याओं को पैदा होने से रोका जा सकेगा। तभी एक कुंठित और हताश अफसर की जगह एक शांत और सुलझा हुआ पुलिसकर्मी जनता से संवाद कर पाएगा, और खाकी के खोए सम्मान के वापस लौटने में यह एक कदम साबित हो सकेगा।