भारत के भीतर वैचारिक हस्तक्षेप का खतरा

पाकिस्तान–तुर्की की भूमिका पर गंभीर बहस क्यों जरूरी है ?

पूनम शर्मा

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा लंबे समय तक सीमाओं, युद्ध, आतंकवाद और सैन्य शक्ति के संदर्भ में होती रही है। लेकिन 21वीं सदी में संघर्ष का स्वरूप बदल रहा है। अब किसी राष्ट्र को कमजोर करने के लिए हमेशा टैंक, मिसाइल या सैनिक आवश्यक नहीं होते। विचारधारा, डिजिटल प्रचार, सामाजिक विभाजन, विदेशी वित्तपोषण, मीडिया अभियानों और असंतोष को राजनीतिक रूप देने की क्षमता भी रणनीतिक हथियार बन सकती है।

सी संदर्भ में अमेरिकी विश्लेषक माइकल  का हालिया लेख गंभीर बहस पैदा करता है। रूबिन  ने आशंका व्यक्त की है कि पाकिस्तान और तुर्की भारत के भीतर धार्मिक पहचान और सांप्रदायिक शिकायतों को एक व्यापक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने यहां तक चेतावनी दी है कि यदि ऐसे प्रयास सफल होते हैं तो भारत के सामने गंभीर आंतरिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। यह एक विश्लेषक की चेतावनी है, कोई प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं; फिर भी इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।

कश्मीर से आगे बढ़ता वैचारिक विमर्श?

पाकिस्तान की भारत नीति में कश्मीर दशकों से केंद्रीय मुद्दा रहा है। लेकिन  पाकिस्तान की कुछ राजनीतिक और सैन्य बयानबाजी अब केवल क्षेत्रीय विवाद तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह भारत के भीतर धार्मिक पहचान की राजनीति को भी प्रभावित करने की कोशिश करती दिखाई देती है।

उन्होंने 2019 में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा दो-राष्ट्र सिद्धांत के समर्थन और 2025 में पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख असीम मुनीर द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्रों के रूप में प्रस्तुत करने वाले वक्तव्यों का उल्लेख किया है। रूबिन  के अनुसार ऐसी भाषा केवल इतिहास की व्याख्या नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दृष्टिकोण का संकेत है जिसमें धार्मिक पहचान को राज्य और राष्ट्र की वैधता से जोड़ा जाता है।

तुर्की के राष्ट्रपति  एर्दोगान ने भी समय-समय पर भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर आलोचनात्मक बयान दिए हैं। 2019 में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े एक कार्यक्रम में उन्होंने भारत में मुस्लिम युवाओं के कथित उत्पीड़न पर सवाल उठाए थे। रूबिन  इन्हें तुर्की की उस व्यापक विदेश नीति से जोड़ते हैं जिसमें अंकारा स्वयं को मुस्लिम जगत में एक राजनीतिक नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।

हालांकि भारत और तुर्की के बीच आधिकारिक राजनयिक संबंध बने हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और उच्च-स्तरीय राजनीतिक संपर्क भी हुए हैं। भारत के विदेश मंत्रालय का आधिकारिक विवरण बताता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एर्दोगान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिले हैं और दोनों देशों ने आर्थिक तथा अन्य द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा की है। इसलिए किसी एक वैचारिक विवाद को पूरे भारत–तुर्की संबंधों का पूर्ण चित्र मानना भी उचित नहीं होगा।

2025 का भारत–पाक तनाव और तुर्की की भूमिका

मई 2025 में भारत–पाकिस्तान तनाव के दौरान एर्दोगान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बातचीत कर पाकिस्तान के प्रति एकजुटता व्यक्त की थी। तुर्की ने भारत की सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए तनाव कम करने की अपील भी की थी। इससे भारत में तुर्की की पाकिस्तान-समर्थक छवि और मजबूत हुई। इसके बाद भारत में तुर्की उत्पादों और पर्यटन के बहिष्कार की नागरिक पहल भी देखने को मिली। यहीं से प्रश्न उठता है—क्या राजनीतिक समर्थन से आगे बढ़कर वैचारिक प्रभाव की कोई संगठित रणनीति भी है? शायद इसका उत्तर हाँ ही है ।

मीडिया और डिजिटल प्रचार का नया मोर्चा

तुर्की के कुछ मीडिया संस्थानों और पाकिस्तान समर्थक टिप्पणीकारों की भारत-विरोधी भाषा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक  है। ऐसे लेख भी हैं   जिनमें भारत को अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित बताया गया या भारत के विभाजन जैसी अतिरंजित भाषा का प्रयोग किया गया। ऐसी सामग्री केवल आलोचना है या किसी रणनीतिक सूचना अभियान का हिस्सा—यह प्रश्न स्वतंत्र जांच की मांग करता है।

आज सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने प्रभाव का स्वरूप बदल दिया है। किसी देश की आंतरिक असंतुष्टि को बाहरी मंच मिनटों में वैश्विक मुद्दा बना सकते हैं। एक स्थानीय घटना को धार्मिक, नस्लीय या वैचारिक संघर्ष के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यही आधुनिक “सूचना युद्ध” की चुनौती है।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है

भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादियों में से एक रहती है। साथ ही यहां हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी और अनेक अन्य समुदाय रहते हैं। सैकड़ों भाषाएं, जातीय समूह और सांस्कृतिक परंपराएं भारत को असाधारण रूप से विविध समाज बनाती हैं। Rubin स्वयं अपने लेख में भारत की इसी बहुलता को उसकी केंद्रीय विशेषता बताते हैं। यही विविधता किसी भी बाहरी शक्ति के लिए संभावित अवसर नहीं, बल्कि भारत के लिए सबसे बड़ी शक्ति बननी चाहिए।

यदि किसी विदेशी शक्ति का उद्देश्य धार्मिक शिकायतों को राजनीतिक हथियार बनाना है, तो उसका सर्वोत्तम उत्तर केवल सुरक्षा कार्रवाई नहीं हो सकता। उसका सबसे प्रभावी उत्तर होगा—निष्पक्ष शासन, कानून का समान अनुप्रयोग, आर्थिक अवसर, सामाजिक संवाद और सभी नागरिकों में राष्ट्रीय भागीदारी की भावना।

“गृहयुद्ध” की चेतावनी कितनी वास्तविक?

यदि भारत की मुस्लिम आबादी का छोटा हिस्सा भी बाहरी कट्टरपंथी प्रचार से प्रभावित हुआ तो गंभीर आंतरिक संघर्ष पैदा हो सकता है। यह एक भयावह परिकल्पना है, लेकिन इसके समर्थन में लेख कोई व्यापक मात्रात्मक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि भारत वास्तव में गृहयुद्ध की दिशा में बढ़ रहा है।

इसलिए ऐसी भाषा को चेतावनी के रूप में पढ़ना चाहिए, भविष्यवाणी के रूप में नहीं। भारत के सामने वास्तविक चुनौती यह है कि वह वैचारिक प्रभाव, आतंकवादी नेटवर्क, विदेशी वित्तपोषण और दुष्प्रचार के मामलों पर सतर्क रहे—लेकिन अपने ही नागरिकों को संदेह की दृष्टि से न देखे।

सुरक्षा और सामाजिक विश्वास—दोनों जरूरी

भारत को पाकिस्तान और तुर्की सहित किसी भी देश से आने वाले दुष्प्रचार, कट्टरपंथी वित्तपोषण या संगठित राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रमाणों की कठोर जांच करनी चाहिए।

लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा केवल खुफिया एजेंसियों और पुलिस से नहीं होती। वह सामाजिक विश्वास से भी होती है।

किसी बाहरी शक्ति की सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब वह देश के नागरिकों को एक-दूसरे का विरोधी बना दे। और उसकी सबसे बड़ी विफलता तब होती है जब मतभेदों के बावजूद नागरिक स्वयं को एक साझा राष्ट्र का हिस्सा मानते रहें।

भारत के लिए वास्तविक संदेश यही है—

सतर्कता आवश्यक है, लेकिन भय नहीं; जांच आवश्यक है,  राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रीय एकता उससे भी अधिक आवश्यक है।

क्योंकि आधुनिक संघर्ष में सीमा की रक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण है समाज के भीतर विश्वास की रक्षा।

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