कांग्रेस काल का फेक-करंसी सिंडिकेट कैसे ध्वस्त हुआ ?

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पूनम शर्मा
कांग्रेस शासनकाल में जाली नोटों के साम्राज्य व देश की मुद्रा प्रणाली को कैसे मौजूदा सरकार ने दशकों पुरानी सड़ांध को काटकर फेंका
समझौते में डूबी रही कांग्रेस सरकार — और कैसे भारत की अर्थव्यवस्था को वर्षों तक खोखला करने वाला फेक-करेंसी का विशाल नेटवर्क कोई साधारण अपराध नहीं था, बल्कि एक बहु-स्तरीय, आधिकारिक ढांचे को भीतर से चाटने वाला भ्रष्ट तंत्र था। यह तंत्र इतना गहराई तक फैला हुआ था कि जाली नोट केवल सीमा पार से नहीं, बल्कि सीधे भारत की आधिकारिक चैनलों — यहाँ तक कि RBI के अंदर से बरामद हो रहे थे।
भारत के इतिहास में शायद ही कोई आर्थिक अपराध ऐसा रहा हो जिसमें विदेशी खुफिया एजेंसियाँ, वैश्विक पेपर-सप्लाई कंपनियाँ, भारतीय मंत्रालयों के अंदरूनी लोग और राजनीतिक शक्ति — सब एक ही धागे में बुने हुए मिले हों।

रिजर्व बैंक की तिजोरियों में मिले थे फेक नोट: सबसे बड़ा झटका

भारत नेपाल सीमा के पास एक बड़े फेक-करेंसी जब्ती ऑपरेशन में अधिकारियों ने जो देखा, वह चौंका देने वाला था। 70 से अधिक बंडल जब्त हुए। पहली नजर में किसी ने सोचा — यह ISI का काम होगा। लेकिन जब जाँच गहरी हुई, तो धमाका हुआ: नोटों के बंडल ISI से नहीं, बल्कि RBI चैनलों से आए थे। यह कोई आम मिलावट नहीं थी — यह सीधे-सीधे सिस्टम के अंदर बैठे गद्दारों का काम था। CBI की छापों में पाया गया था कि कई नोटों में 16 में से 17 सुरक्षा फीचर “पूरी तरह मेल खाते” थे, केवल एक फीचर जान-बूझकर छोड़ा गया था — ताकि ‘फेक’ कहते हुए भी वे असल जैसे दिख सकें। यह गुणवत्ता तब तक संभव नहीं जब तक मुद्रा-प्रिंटिंग सिस्टम के अंदर से पेपर, प्लेट और फीचर्स लीक न हुए हों।

विदेशी कंपनियों का काला खेल: एक ही सप्लायर से भारत–पाकिस्तान दोनों को कागज़

सबसे हैरान करने वाला तथ्य यह था कि: भारत ,पाकिस्तान, ISI भी तीनों एक ही जर्मन कंपनी (Giesecke & Devrient – G&D) से करंसी ग्रेड पेपर खरीदते थे। यह संबंध कोई नया नहीं था। 1949 से पाकिस्तान और इस कंपनी का रिश्ता था। भारत का प्रवेश बाद में हुआ — लेकिन गलत समय पर, गलत हाथों द्वारा।
2005 में हुए एक बड़े विवाद में एक संदिग्ध पेपर-सप्लाई कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया गया, लेकिन कुछ ही महीनों में कांग्रेस शासन में उसे दोबारा मंजूरी दे दी गई। प्रणब मुखर्जी ने कंपनी को ब्लैकलिस्ट करवाया था। लेकिन पी. चिदंबरम के कार्यकाल में, वित्त मंत्रालय ने उसी कंपनी को फिर से अंदर घुसा दिया, वह भी बिना NSA या गृह मंत्रालय को बताए। यही मामला बाद में अरविंद मायाराम की ED रेड में खुलकर सामने आया।पी. चिदंबरम हमेशा से वित्त मंत्रालय अपने पास रखते थे ।

फेक करेंसी और पाकिस्तान: भारत को ‘पोषण’ देने वाला

यह खेल केवल नकली नोटों तक सीमित नहीं था। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यही थी:
हवालों के जरिए करोड़ों की आमद ,विदेशी पेपर से चलने वाला जाली नोट उद्योग ,नकद अर्थव्यवस्था की चोरी अजीब लेकिन सच बात यह है कि पाकिस्तान की असली अर्थव्यवस्था उससे कहीं कम थी जितना वह भारत से चुराता था।जाली नोटों और हवालों से पाकिस्तान को हर साल: 500 करोड़ रुपये आधिकारिक रूप से और 12 मिलियन डॉलर अनऑफिशियल रूप से मिलते थे।यही वह “इकोनॉमिक ऑक्सीजन” थी जिसने पाकिस्तान को गिरने नहीं दिया।

कांग्रेस शासन: रहस्यमयी फाइलें, संदिग्ध सौदे, और ब्रिटिश–ISI लिंक

जाँचों में सामने आया कि ब्रिटेन के MI6 ने ISI को खड़ा किया पाकिस्तान के जाली नोट नेटवर्क का हेडक्वार्टर लंदन था कई विदेशी कंपनियाँ ब्रिटिश राजघराने से जुड़ी हुई थीं भारत का पेपर सप्लाई भारत–नेपाल सीमा के पास स्थित था, ठीक वहीं जहां से 90% फेक करेंसी आती थी
2005–2012 के बीच इन विदेशी कंपनियों के साथ भारत के सौदे और भी गहरे होते गए।
एक गुप्त रिपोर्ट में पाया गया कि अमेरिकी जर्मन यूरोपीय तीनों सप्लायर सुरक्षा-अनुरूपता में फेल हुए थे — लेकिन किसी को ब्लैकलिस्ट नहीं किया गया। केवल एक भारतीय सप्लायर को “उदाहरण” बनाने के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया, जिसे जल्द ही पुनः बहाल कर दिया गया।

हवाला और काला पैसा: कांग्रेस शासन ने ही खोला मॉरीशस वाला दरवाजा

जिस “मॉरीशस विदेशी निवेश ” की चर्चा देश में दशकों तक होती रही वह असल में भारतीय काले धन को वापस भारत में सफेद करने का सबसे आसान रास्ता था। इस नेटवर्क को भी कांग्रेस-युग की ही नीतियों ने जन्म दिया था।

सफाई: मोदी सरकार ने क्या बदला?

2016 के बाद इस पूरे सिस्टम की रीढ़ तोड़ दी गई।
1. भारत अब अपना 100% करंसी पेपर बनाता है
पहले: भारत को 22–24 हज़ार टन पेपर चाहिए लेकिन देश में उत्पादन सिर्फ 12 हज़ार टन बाकी सब आयात — और वहीं से लीक नागपुर, बालासोर, मध्यप्रदेश में नए प्लांट जिनकी कुल क्षमता: 30–36 हज़ार टन है भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर है यही वह कदम था जिसने फेक-करंसी का पूरा धंधा खत्म कर दिया।
2. डिमोनेटाइजेशन की असली उपलब्धि लोग कहते हैं 99% पैसा वापस आ गया — तो फायदा क्या?
लेकिन असल गणित यह था:
X = असली मुद्रा Y = नकली मुद्रा
यही कारण था कि कानूनी मुद्रा का 99% लौटा, लेकिन जाली मुद्रा पूरी तरह जल गई सरकार चाहती थी: 99% of X वापस आए 0% of Y वापस आए वही हुआ 99% असली मुद्रा वापस आई

3. आंतरिक सिंडिकेट की रीढ़ टूटी
RBI, वित्त मंत्रालय, और विदेशी कंपनियों से जुड़े भीतरघाती नेटवर्क को चिन्हित किया गया।
कई अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। कागज़ और सुरक्षा फीचर्स में पहले जैसी कोई लीक अब असंभव है।
यह केवल आर्थिक सफाई नहीं थी — यह राष्ट्रीय सुरक्षा का युद्ध था**
कांग्रेस शासनकाल में:विदेश-आश्रित मुद्रा प्रणाली, संदिग्ध पेपर सप्लायर, पाकिस्तान को हुआ लाभ, ISI और RBI के भीतर घुसे चैनलों की सांठगांठ, लंदन-आधारित खुफिया नेटवर्क का दखल, और भ्रष्ट मंत्रालयों के गठजोड़—इन सबने मिलकर भारत की मुद्रा व्यवस्था को भीतर तक खोखला कर दिया था।

2016 के बाद:

पूर्ण पेपर आत्मनिर्भरता

फेक-करंसी नेटवर्क का खात्मा

हवालों पर रोक

विदेशी कंपनियों की सफाई

और आंतरिक सिंडिकेट की समाप्ति ने भारत को पहली बार मुद्रा सुरक्षा के मामले में स्वतंत्र बनाया।

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