- नई दिल्ली में 17वां एनसीपीईडीपी-एमफेसिस यूनिवर्सल डिज़ाइन अवार्ड्स समारोह, 14 व्यक्ति-प्रतिष्ठानों को सम्मान।
- पुरस्कार चार श्रेणियों—दिव्यांगजन रोल मॉडल, प्रोफेशनल्स, कंपनियां-संस्थाएं, और जावेद अबिदी पब्लिक पॉलिसी अवार्ड—में दिए गए।
- मुख्य वक्ताओं एवं विशेषज्ञों ने समावेशी डिज़ाइन को नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी बताया।
- 17 वर्षों की यात्रा में असिस्टिव टेक्नोलॉजी से लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुगम्यता को मौलिक अधिकार मानने तक की प्रगति रेखांकित।
समग्र समाचार सेवा |
नई दिल्ली, 14 अगस्त:भारत में समावेशन, सुगम्यता और यूनिवर्सल डिज़ाइन के क्षेत्र में बदलाव लाने वाले 14 व्यक्तियों और संगठनों को आज 17वें एनसीपीईडीपी-एमफेसिस यूनिवर्सल डिज़ाइन अवार्ड्स 2026 से सम्मानित किया गया। होटल ताज महल, नई दिल्ली में आयोजित समारोह में सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (STPI) के महानिदेशक श्री अरविंद कुमार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, उद्योग, नीति-निर्माण, तकनीक और दिव्यांगजन अधिकार क्षेत्र से जुड़े प्रमुख प्रतिनिधि मौजूद रहे।
एनसीपीईडीपी और एमफेसिस द्वारा स्थापित ये पुरस्कार समावेशी और सुगम डिज़ाइन को नवाचार की पहली शर्त के रूप में मान्यता देने के लिए दिए जाते हैं। इस वर्ष के प्रमुख विजेताओं में श्री निलेश सिंगीत, सुश्री जयना कोठारी, जय वकील फाउंडेशन, डॉ. स्रुति मोहापात्रा, यूनिलीवर पीएलसी, एनसीईआरटी और गैबिफाई जैसी संस्थाएं शामिल हैं।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एनसीपीईडीपी के कार्यकारी निदेशक श्री अरमान अली ने कहा कि आज सुगम्यता एक अधिकार और दायित्व बन चुकी है। एमफेसिस की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सुश्री दीपा नागराज ने कहा कि समावेशी डिज़ाइन आज डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, AI और पब्लिक पॉलिसी का मूलभूत हिस्सा है।
फायरसाइड चैट में STPI महानिदेशक श्री अरविंद कुमार ने सहायक तकनीक और वित्तीय मॉडल की भूमिका पर प्रकाश डाला, जिससे सुगम टेक्नोलॉजी का व्यापक विस्तार संभव होगा। कार्यक्रम में 17 वर्षों की यात्रा—असिस्टिव टेक्नोलॉजी हब से लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुगम्यता को मौलिक अधिकार मानने तक—की चर्चा हुई।
आज भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में यूनिवर्सल डिज़ाइन की भूमिका और महत्ता अभूतपूर्व है। अब समावेशी डिज़ाइन सुविधा नहीं, बल्कि अवसर और समानता की आधारशिला है। समारोह ने संदेश दिया—“सुगम्यता कोई बाद का विचार नहीं; यह बेहतर और समावेशी भारत की पहली शर्त है।”