शिक्षा का उद्देश्य केवल करियर निर्माण नहीं: भागवत
आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने छात्रों और शिक्षकों से किया संवाद, कहा- मनुष्य निर्माण से ही संभव है मजबूत राष्ट्र का निर्माण।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल करियर बनाना नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण करना है।
- उन्होंने नई पीढ़ी की ईमानदारी और साहस की सराहना करते हुए युवाओं से देश के विकास में योगदान देने का आह्वान किया।
- आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों और संस्कारों को आत्मसात करने पर विशेष जोर दिया गया है।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 17 सितंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के महत्व पर बेहद प्रेरणादायक और गहरे विचार साझा किए। आई.आई.एल.एम. विश्वविद्यालय और बेनयान ट्री विद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कक्षा 10 से लेकर स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) तक के छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद किया और उनके विभिन्न प्रश्नों के सटीक उत्तर दिए। इस गरिमामयी कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज की शिक्षा प्रणाली को केवल किताबी ज्ञान और रोजगार तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका मुख्य ध्येय एक बेहतर और संवेदनशील इंसान तैयार करना होना चाहिए।
नई पीढ़ी की ईमानदारी और प्रतिभा पलायन पर विचार
विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए संघ प्रमुख ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए और कहा कि उनका मानना है कि आज की नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार है और उनमें प्राकृतिक रूप से आगे बढ़ने का साहस भी अधिक है। देश से प्रतिभा पलायन (Brain Drain) के मुद्दे पर युवाओं का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विदेशों में भौतिक सुख-सुविधाएं मिल सकती हैं, लेकिन मनुष्य की असली पहचान उसकी मातृभूमि से होती है। भारत की इस पावन माटी के अन्न-जल से ही हमारा शरीर पोषित हुआ है। इसलिए जीवन में आवश्यकता के अनुरूप अपने पास रखकर बाकी का हिस्सा समाज और देश के प्रति समर्पित कर देना चाहिए।
मनुष्य निर्माण और जीवन के वास्तविक उदाहरण
शिक्षा के असल मायने समझाते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो मनुष्य को पशु से अलग और श्रेष्ठ बनाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि महान संत नीब करोरी बाबा और स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की औपचारिक स्कूली शिक्षा भले ही बहुत अधिक नहीं रही हो, लेकिन वे समाज के सच्चे ‘लीडर’ बने क्योंकि उनका मनुष्यता और चरित्र का स्तर अत्यंत ऊंचा था। इसी प्रकार आधुनिक तकनीकी दुनिया के दिग्गज स्टीव जॉब्स भी आध्यात्मिक शांति की तलाश में भारत आए थे। आज के समय में आधुनिक तकनीक के ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्यों और मानवता के गुणों को बढ़ाने वाली शिक्षा की सबसे ज्यादा आवश्यकता है।
भारत को विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित करना
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने देश के भविष्य को लेकर कहा कि भारत का लक्ष्य दुनिया की केवल एक साधारण आर्थिक या सैन्य महाशक्ति बनना नहीं है, बल्कि देश को ‘विश्वगुरु’ के सिंहासन पर पुनः आसीन करना है। ‘मनुष्यता का ज्ञान’ और सांस्कृतिक चेतना ही भारत की असली पहचान है, जो पूरी दुनिया को एक नई राह दिखा सकती है। कार्यक्रम की शुरुआत में आई.आई.एल.एम. के चेयरमैन अनिल राय ने अपनी प्रस्तावना रखते हुए इस संवाद के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए ऐसे आयोजनों को बेहद महत्वपूर्ण बताया।