चुनाव आयोग पर राजनीतिक विवाद: लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रहार कितना उचित?
चुनावी हार-जीत से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा, मतदाता सूची की शुद्धता और राजनीतिक जवाबदेही पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता।
पूनम शर्मा
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति केवल करोड़ों मतदाता या नियमित चुनाव नहीं, बल्कि उन संवैधानिक संस्थाओं में जनता का विश्वास है, जिनके माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित होती है। भारतीय निर्वाचन आयोग ऐसी ही एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
हाल के दिनों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) और कथित वोट चोरी को लेकर जो राजनीतिक विवाद हुआ है केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी को संसद में इन विषयों पर बहस की चुनौती ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लगातार राजनीतिक आरोप लगाना लोकतंत्र को मजबूत करता है, अथवा जनता को दिग्भ्रमित करता है?
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला
निर्वाचन आयोग किसी सरकार, राजनीतिक दल या विचारधारा का प्रतिनिधि नहीं है। उसका संवैधानिक दायित्व प्रत्येक पात्र नागरिक को निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया उपलब्ध कराना है।
ऐसे में आयोग के निर्णयों की आलोचना और उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा लोकतांत्रिक अधिकार हैं। लेकिन आलोचना तथा बिना पर्याप्त प्रमाण के किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता को संदेह के घेरे में खड़ा करने के बीच स्पष्ट अंतर है।
यदि किसी राजनीतिक दल को मतदाता सूची में अनियमितता, ईवीएम की कार्यप्रणाली या चुनाव संचालन पर आपत्ति है, तो उसके पास कानूनी, प्रशासनिक और न्यायिक रास्ते उपलब्ध हैं। आरोपों के साथ ठोस दस्तावेज और प्रमाण प्रस्तुत करना राजनीतिक जिम्मेदारी का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।
SIR: मतदाता सूची की शुद्धता क्यों आवश्यक?
भारत जैसे विशाल देश में मतदाता सूची का नियमित सत्यापन अत्यंत आवश्यक है। मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरे पंजीकरण, स्थान परिवर्तन और अन्य गलत प्रविष्टियों को दुरुस्त करना निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है।
विशेष गहन पुनरीक्षण का मूल उद्देश्य मतदाता सूची की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना होना चाहिए। लेकिन इस प्रक्रिया में यह सावधानी भी अनिवार्य है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से न हटे।
इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुरक्षा को एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। दोनों ही लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक हैं।
ईवीएम पर सवाल और राजनीतिक विरोधाभास
ईवीएम को लेकर जारी विवाद में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विरोधाभास भी दिखाई देता है। जब कोई राजनीतिक दल चुनाव जीतता है, तो वह जनादेश को लोकतंत्र की विजय बताता है। लेकिन पराजय के बाद उसी चुनावी व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
अमित शाह ने हैदराबाद में इसी विरोधाभास को रेखांकित करते हुए कांग्रेस की विभिन्न राज्यों में चुनावी जीत का उदाहरण दिया और राहुल गांधी को संसद में चर्चा की चुनौती दी।
हालांकि चुनावी जीत अपने आप में प्रत्येक तकनीकी या प्रशासनिक शिकायत का समाधान नहीं है। किसी विशिष्ट अनियमितता का प्रमाण उपलब्ध होने पर उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन बिना प्रमाण के व्यापक चुनावी धांधली का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं है।
विपक्ष की भूमिका केवल विरोध नहीं, जिम्मेदारी भी
लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष आवश्यक है। सरकार से प्रश्न पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना विपक्ष का अधिकार है।
लेकिन इस अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। जब किसी संस्था के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उनके प्रमाण प्रस्तुत करना भी उतना ही जरूरी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त या निर्वाचन आयोग के विरुद्ध राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत आरोपों, धमकियों या बिना प्रमाण के आपराधिक निष्कर्षों में बदलना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं कहा जा सकता।
संसद बने बहस का मंच, सड़क नहीं बने अंतिम न्यायालय
अमित शाह द्वारा विशेष संसदीय सत्र में चर्चा की तत्परता व्यक्त करना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। संसद वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है जहां निर्वाचित प्रतिनिधि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग सकते हैं।
राहुल गांधी ने बहस की चुनौती के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से खुली चर्चा की मांग की है। इससे स्पष्ट है कि विवाद अब संसदीय विमर्श की दिशा में भी बढ़ सकता है।
यदि वास्तव में विशेष सत्र आयोजित होता है, तो उसमें SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार, अपील व्यवस्था, ईवीएम की तकनीकी सुरक्षा और चुनाव आयोग की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर तथ्यपरक चर्चा होनी चाहिए।
संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा राष्ट्रीय जिम्मेदारी
भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में चुनाव आयोग की संस्थागत प्रतिष्ठा किसी एक दल की राजनीतिक पूंजी नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की लोकतांत्रिक धरोहर है। । चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और निष्पक्षता इतनी मजबूत होनी चाहिए कि तथ्यपरक आलोचना का उत्तर संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से दिया जा सके। लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल जीतते और हारते हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा यदि जनता के मन में प्रत्येक चुनाव परिणाम के प्रति अविश्वास पैदा करने लगे, तो अंततः नुकसान किसी एक दल का नहीं, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का होगा। इस बात को विपक्ष को ध्यान में रखने की आवश्यकता है । देश की लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर सड़क पर आकर प्रहार करना एवं अराजकता का आश्रय लेना यह एक ठीक संदेश नहीं है ।
निष्कर्षतः चुनाव आयोग की गरिमा की रक्षा का सबसे प्रभावी मार्ग अंधसमर्थन या अंधविरोध नहीं, बल्कि प्रमाण, पारदर्शिता, संवैधानिक मर्यादा और राजनीतिक जवाबदेही है। लोकतंत्र को आरोपों के शोर से नहीं, संस्थाओं में विश्वास और तथ्यों पर आधारित बहस से मजबूत किया जा सकता है।