पूर्वोत्तर की सीमा सुरक्षा: घुसपैठ, तस्करी और अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों के बीच भारत के सामने नई रणनीतिक चुनौतियां
पूनम शर्मा
बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता, म्यांमार के सशस्त्र संघर्ष, सीमापार अपराध और चीन की सामरिक गतिविधियों ने भारत के पूर्वोत्तर को राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।
भारत का पूर्वोत्तर केवल आठ राज्यों का भौगोलिक समूह नहीं, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच देश का सामरिक प्रवेशद्वार है। प्राकृतिक संसाधनों, सांस्कृतिक विविधता और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से समृद्ध यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा, आर्थिक विकास और एक्ट ईस्ट नीति का महत्वपूर्ण आधार है।
लेकिन आज इस क्षेत्र के सामने चुनौती केवल अवैध घुसपैठ या सीमा पर होने वाली तस्करी तक सीमित नहीं है। पड़ोसी देशों की राजनीतिक अस्थिरता, उग्रवादी नेटवर्क, मादक पदार्थों का अंतरराष्ट्रीय कारोबार, साइबर अपराध और विदेशी शक्तियों की सामरिक प्रतिस्पर्धा ने सुरक्षा के प्रश्न को कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि पूर्वोत्तर की सुरक्षा में छोटी-सी चूक का प्रभाव केवल सीमावर्ती जिलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसांख्यिकीय संतुलन, आर्थिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक पहुंच सकता है।
त्रिपुरा में बीएसएफ जवानों पर हमला: खतरे की गंभीर चेतावनी
2 नवंबर को त्रिपुरा के सिपाहीजला जिले के बॉक्सनगर स्थित आशाबाड़ी क्षेत्र में कथित तस्करों के हमले में सीमा सुरक्षा बल के तीन जवान घायल हो गए। हमलावरों ने हथियार छीनने का प्रयास किया और सरकारी वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया। मुख्यमंत्री माणिक साहा ने घटना की निंदा करते हुए कठोर कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए। 3 नवंबर तक आठ लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई है। यह घटना सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्या से कहीं अधिक गंभीर है। सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों पर संगठित हमला इस आशंका को जन्म देता है कि कुछ तस्करी नेटवर्क स्थानीय स्तर पर इतने प्रभावशाली हो सकते हैं कि वे सुरक्षा एजेंसियों को चुनौती देने का साहस करें।
इस घटना के पीछे किसी विदेशी खुफिया एजेंसी या अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की भूमिका भी हो सकती है इस बात को नकारा नहीं जा सकता ।
बांग्लादेश और अवैध घुसपैठ की चुनौती
गृह मंत्रालय के अनुसार पूर्वोत्तर की लगभग 5,484 किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा में बांग्लादेश से लगी सीमा लगभग 1,880 किलोमीटर है। इस क्षेत्र की नदियां, दुर्गम भूभाग और घनी आबादी सीमा प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
अवैध आव्रजन, मानव तस्करी, नकली दस्तावेज और सीमापार आपराधिक नेटवर्क सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता के विषय हैं।
बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव भारत की सीमा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। ऐसे समय में सीमावर्ती जिलों में निगरानी, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग विशेष महत्व रखते हैं।
लेकिन अवैध घुसपैठ और वैध सीमा-पार आवागमन में अंतर करना आवश्यक है। किसी समुदाय या नागरिक की पहचान मात्र के आधार पर उसे सुरक्षा खतरा मानना उचित नहीं होगा।
म्यांमार का गृहयुद्ध और मादक पदार्थों का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क
मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से जुड़ी भारत-म्यांमार सीमा लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी है। म्यांमार में सैन्य शासन और सशस्त्र संघर्ष ने सीमावर्ती सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ाई हैं। हथियारों की तस्करी, उग्रवादी संगठनों की आवाजाही और नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार के कारण यह क्षेत्र संवेदनशील है।
म्यांमार का संबंध तथाकथित गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र से भी है, जो अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ कारोबार के लिए जाना जाता है।
यहां समस्या केवल नशीले पदार्थों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उनसे उत्पन्न अवैध आय का संभावित उपयोग संगठित अपराध, हथियार खरीद और हिंसक गतिविधियों में होना भी है।
चीन की सामरिक गतिविधियां और पूर्वोत्तर का रणनीतिक महत्व
अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पूर्वोत्तर की सुरक्षा का महत्वपूर्ण आयाम है। चीन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विस्तार, सीमा संबंधी दावे और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के प्रयास भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां उत्पन्न करते हैं।
विशेष रूप से सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण भूभाग है। इस क्षेत्र की सुरक्षा और वैकल्पिक संपर्क मार्गों का विकास राष्ट्रीय प्राथमिकता होना चाहिए।
हालांकि चीन की सामरिक प्रतिस्पर्धा और त्रिपुरा में तस्करों के हमले जैसी घटनाओं को एक ही अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा बताने के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
क्या विदेशी शक्तियां पूर्वोत्तर में अस्थिरता का लाभ उठा सकती हैं?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतिद्वंद्वी देश अक्सर दूसरे देशों की आंतरिक कमजोरियों का रणनीतिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। पूर्वोत्तर में जातीय तनाव, उग्रवाद, सीमापार अपराध और गलत सूचनाओं का प्रसार ऐसी कमजोरियां पैदा कर सकते हैं। इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के सामने पारंपरिक सैन्य चुनौतियों के अतिरिक्त साइबर गतिविधियों, अवैध वित्तपोषण और दुष्प्रचार की निगरानी का भी दायित्व है।
विदेशी हस्तक्षेप की किसी विशिष्ट घटना का निष्कर्ष खुफिया जांच और सत्यापित साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। आशंका और प्रमाणित षड्यंत्र के बीच अंतर बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।
सुरक्षा के साथ विकास भी अनिवार्य
पूर्वोत्तर की सुरक्षा केवल सीमा पर अतिरिक्त जवान तैनात करने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए आधुनिक निगरानी उपकरण, ड्रोन, स्मार्ट फेंसिंग, बेहतर सड़क संपर्क, स्थानीय पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय आवश्यक है।
साथ ही सीमावर्ती युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा और वैध व्यापार के अवसर बढ़ाने होंगे, ताकि तस्करी और आपराधिक नेटवर्क उन्हें आकर्षित न कर सकें। भारत सरकार ने सीमा प्रबंधन के अंतर्गत बाड़बंदी, फ्लडलाइट, सीमा चौकियों और संपर्क मार्गों के विकास जैसी पहलें की हैं।
निष्कर्ष: पूर्वोत्तर की सुरक्षा ही भारत की रणनीतिक शक्ति
त्रिपुरा में बीएसएफ जवानों पर हमला याद दिलाता है कि सीमा सुरक्षा केवल सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासन, समाज और राजनीतिक नेतृत्व की साझा राष्ट्रीय प्राथमिकता है। भारत को एक ऐसी समग्र रणनीति अपनानी होगी, जिसमें मजबूत सीमा प्रबंधन, प्रभावी खुफिया तंत्र, पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक सहयोग और स्थानीय नागरिकों का विश्वास समान रूप से महत्वपूर्ण हों।
पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता, आर्थिक भविष्य और एशिया में उसकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करना है।