- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मोती बीए की 107वीं जयंती पर स्मृति-संगोष्ठी का आयोजन
- हिन्दी सिनेमा में भोजपुरी को प्रतिष्ठा दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय मोती बीए को—मनोज भावुक
- ‘नदिया के पार’ (1948) के भोजपुरी गीतों से मिली राष्ट्रीय पहचान
- मोती बीए ने करीब 80 फिल्मों के लिए गीत और 40 से अधिक पुस्तकें लिखीं
- साहित्यकारों ने मोती बीए के बहुपक्षीय योगदान और सहज व्यक्तित्व को याद किया
समग्र समाचार सेवा
वाराणसी, 2 अगस्त :काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भोजपुरी अध्ययन केन्द्र द्वारा महान साहित्यकार और लोकप्रिय फिल्म गीतकार मोती बीए की 107वीं जयंती के अवसर पर राहुल सभागार में भव्य स्मृति-संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल ने की और संयोजन प्रो. प्रभाकर सिंह ने किया।
मुख्य वक्ता मनोज भावुक ने कहा कि हिन्दी सिनेमा में भोजपुरी को प्रतिष्ठा दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय मोती बीए को जाता है। बीएचयू से बीए की उपाधि प्राप्त करने के बाद ‘बीए’ उनके नाम का हिस्सा बन गया। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म ‘नदिया के पार’ के सभी भोजपुरी गीतों ने पूरे देश में भोजपुरी की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। मोती बीए ने लगभग 80 फिल्मों के लिए गीत लिखे, 40 से अधिक किताबें रचीं और बहुभाषी साहित्य-सृजन किया।
विवेक निराला ने मोती बीए की प्रमुख कृतियों का उल्लेख करते हुए उनके साहित्य को लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज बताया। वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यनारायण सिंह ने मोती बीए से जुड़े संस्मरण साझा किए और उनके सहज व्यक्तित्व को याद किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि मोती बीए की आत्मा भोजपुरी में बसती थी और उन्होंने भोजपुरी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
अंत में प्रो. प्रभाकर सिंह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों व विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि ऐसे मनीषियों की स्मृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाना भोजपुरी अध्ययन केन्द्र का दायित्व है।
इस अवसर पर प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. देवेंद्र, विंध्याचल यादव, हरीश कुमार, अनीता सिंह सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे और सभी ने मोती बीए को श्रद्धांजलि अर्पित की।