मज़दूर आंदोलन : वेतन से आगे, सामाजिक न्याय की लड़ाई

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अरुण कुमार डनायक
मजदूर संगठनों पर एक आरोप यह भी लगता रहा है कि वे अपने वेतन-भत्तों, सुविधाओं और अधिक-से-अधिक काम तथा रहन-सहन की परिस्थितियों यानि कि एक तरह के ‘अर्थवाद’ से बाहर नहीं निकल पाते, लेकिन क्या यह सही है? भारत समेत दुनियाभर के अनुभव बताते हैं कि मजदूरों ने जीवन की तमाम बुनियादी बातों के संघर्ष में अगुआई की है।

‘अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस’ : एक मई

‘मज़दूर दिवस’ Labour Day पर श्रमिक आंदोलनों की चर्चा अक्सर फ़ैक्टरी गेट पर विरोध, नारेबाज़ी, अति-आवश्यक सेवाओं को ठप कर देने या हड़तालों की हिंसक छवियों, शहरों के उद्योग बंद होने की कहानियों तक सीमित रह जाती है। यह दृष्टि उस बड़े सत्य को अनदेखा कर देती है कि दुनिया के मजदूर केवल अपने अधिकारों के लिए ही नहीं, बल्कि देशहित, लोकतंत्र और मानव गरिमा की रक्षा के लिए भी निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं।

भारत में भी श्रमिक वर्ग ने यह भूमिका निभाई है। ‘चम्पारण सत्याग्रह’ में खेतिहर मजदूर नील‑किसानों के साथ खड़े रहे; 1918 में अहमदाबाद, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान मुंबई की मिल हड़ताल और ‘दांडी यात्रा’ में कारीगरों, नमक‑निर्माताओं और तटीय मजदूरों ने औपनिवेशिक अन्याय के विरुद्ध व्यापक जनशक्ति खड़ी कर मजदूरों की सामूहिक शक्ति प्रदर्शित की थी। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में महाड़ के ‘चवदार तालाब सत्याग्रह’ में दलित श्रमिकों ने सामाजिक समानता की लड़ाई को नई दिशा दी थी।

इसी वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अमेरिका का ‘नागरिक अधिकार आंदोलन’ एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। ‘जिम क्रो’ नियमों के तहत अमेरिका में अश्वेत नागरिकों को ‘अलग, लेकिन समान’ के नाम पर अपमानजनक भेदभाव का सामना करना पड़ता था। सार्वजनिक सुविधाएँ, जैसे – बस, ट्रेन, पार्क, स्कूल आदि में व्यवस्थाएँ अलग-अलग थीं और मतदान में बाधा डालने के लिए ‘साक्षरता परीक्षण’ व ‘पोल टैक्स’ जैसे उपाय थे। इन असमानताओं के विरुद्ध 1950-60 में व्यापक जनांदोलन उभरे, जिनमें श्वेत और अश्वेत सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अश्वेत श्रमिकों ने अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर संघर्ष को दिशा दी।

इन आंदोलनों की रीढ़ घरेलू कामगार, औद्योगिक श्रमिक और उनके संगठन थे, जिन्होंने हर स्तर पर संघर्ष को जीवित रखा। ग्रामीण इलाकों में हिंसा और दमन के बावजूद खेतिहर मजदूरों व बटाईदारों ने यूनियनें बनाईं और ‘फ्रीडम समर’ जैसे अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। इन सबके बीच पादरी मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) इस आंदोलन के सबसे प्रेरक और नैतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे। उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसा, ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ व सत्याग्रह से प्रेरित होकर श्रमिक वर्ग की शक्ति को संगठित कर संघर्ष को राष्ट्रीय स्वरूप दिया।

एक दिसंबर 1955 को एक साधारण कामकाजी महिला रोज़ा पार्क्स द्वारा मॉन्टगोमरी की बस में श्वेत अमेरिकी नागरिक के लिए अपनी सीट छोड़ने से इनकार करना अचानक उपजा विद्रोह नहीं था। यह वर्षों से सहते आ रहे अपमान के विरुद्ध एक शांत, पर निर्णायक प्रतिकार था। उनकी गिरफ्तारी ने अश्वेत समाज को झकझोर दिया और 381 दिनों तक चलने वाले ‘मॉन्टगोमरी बस बहिष्कार’ की शुरुआत हुई। इस बहिष्कार की असली ताकत घरेलू कामगार महिलाएँ, औद्योगिक श्रमिक, खेतिहर मजदूर और निम्न‑आय वर्ग के वे लोग थे, जो रोज़मर्रा के आवागमन के लिए इन्हीं बसों पर निर्भर थे। बहिष्कार का सबसे बड़ा बोझ भी इन्हीं ने उठाया। लोग मीलों पैदल चले, चर्चों की वैनें चलीं, कार-पूल बने, टैक्सी चालकों ने कम किराए पर यात्राएँ कराईं। सुबह अँधेरे में निकलने वाली घरेलू कामगार महिलाएँ और मजदूर, लंबी दूरी पैदल चलने की कठिनाइयों के बावजूद डटे रहे।

दूसरी ओर श्वेत प्रतिरोध लगातार हिंसक होता गया, किंग के घर पर बम फेंके गए, कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेलों में प्रताड़ित किया गया और आंदोलनकारियों को निरंतर धमकियाँ दी गईं। इसके बावजूद आंदोलन की आत्मा गांधीजी की अहिंसा के अनुरूप ही रही; जेल की कोठरियों और सड़कों पर ‘वी शैल ओवरकम’ जैसे आशा‑भरे गीत गूँजते रहे। मनुष्य की गरिमा और समानता का प्रतीक यह गीत भारत में भी ‘हम होंगे कामयाब एक दिन’ के रूप में लोकप्रिय हुआ।

‘मॉन्टगोमरी बस आंदोलन’ की श्रमिक‑आधारित नैतिक शक्ति ने विद्यार्थियों में भी प्रतिरोध की नई चेतना जगाई। इसी प्रेरणा से 1960 का ‘सिट‑इन मूवमेंट’ जन्मा, जब ग्रीन्सबोरो के चार छात्रों ने श्वेत‑आरक्षित लंच-काउंटर पर बैठकर अलगाव को चुनौती दी। कुछ ही महीनों में हजारों छात्रों ने इस अहिंसक सत्याग्रह के माध्यम से नस्लीय भेदभाव के खिलाफ बिगुल फूंक दिया।

1961 का ‘फ्रीडम राइड आंदोलन,’ जिसकी रीढ़ श्रमिक और छात्र थे, अमेरिकी लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा बन गया। बसों में सवार शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर श्वेत भीड़ की क्रूर हिंसा और गिरफ्तार अश्वेत यात्रियों को प्रताड़ित किये जाने की ख़बरों ने अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि को गहरा आघात पहुँचाया।

1963 का ‘मार्च ऑन वॉशिंगटन’ आज भले ही किंग के ‘आई हैव अ ड्रीम’ भाषण से पहचाना जाता हो, पर इसकी नींव श्रमिक नेता ए. फिलिप रैंडोल्फ और ‘ब्रदरहुड ऑफ स्लीपिंग कार पोर्टर्स यूनियन’ ने रखी थी। इस मार्च का आधिकारिक नाम ‘नौकरियों और स्वतंत्रता के लिए वॉशिंगटन मार्च’ स्पष्ट करता है कि यह आंदोलन मूलतः श्वेत और अश्वेत मजदूरों के बीच समानता, आर्थिक न्याय और श्रमिक अधिकारों की माँग से उपजा था। ‘वॉशिंगटन मार्च’ ने न केवल नस्लीय भेदभाव के खिलाफ एक सशक्त आवाज उठाई, बल्कि सिद्ध किया कि श्रमिक आंदोलन, अहिंसा और शांतिपूर्ण अनुशासन के द्वारा व्यापक सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

मार्टिन लूथर किंग द्वारा ‘आंदोलन की जननी’ कही जाने वाली सेप्टिमा क्लार्क का योगदान नस्लीय भेदभाव के इतिहास में अद्वितीय है। उनके ‘सिटीजनशिप स्कूलों’ ने अश्वेत श्रमिकों को साक्षर बनाया, उन्हें मतदान के लिए पंजीकरण कराने में सक्षम किया, यूनियनों और आंदोलनों में नेतृत्व विकसित किया। उनके प्रयासों का ही सुखद परिणाम है कि आज अमेरिकी कांग्रेस में अश्वेत प्रतिनिधित्व अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर पर है और यह सब बिना किसी आरक्षण के संभव हुआ है।

इन आन्दोलनों से बढ़ते दबाव के कारण राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी को हस्तक्षेप करना पड़ा; उन्होंने आंदोलन को टकराव और हिंसा से हटाकर मतदाता‑पंजीकरण जैसे लोकतांत्रिक कदमों की ओर मोड़ा, अंतरराज्यीय परिवहन में नस्लीय भेदभाव समाप्त करने के लिए संघीय आदेश लागू किए और नागरिक अधिकारों पर व्यापक कानून लाने की घोषणा की। दुर्भाग्य से 1963 में कैनेडी की हत्या हो गई और उनके बाद 1964 में ‘सिविल राइट्स एक्ट’ पारित हुआ।इतिहास बताता है कि श्रमिक वर्ग केवल वेतन और सुविधाओं की लड़ाई नहीं लड़ता, बल्कि लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के आंदोलनों का प्रमुख वाहक रहा है। परिवर्तन की सबसे सशक्त पटकथा अक्सर उन्हीं हाथों से लिखी जाती है, जिनमें मेहनत के निशान होते हैं। अमेरिका में सामाजिक कार्यकर्ताओं को कई बार कम्युनिस्ट, विध्वंसक या व्यवस्था के लिए खतरा बताकर आरोपित किया गया। भारत में भी सामाजिक आंदोलनों पर ऐसे आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं और उन्हें राजनीतिक द्वेष व वित्तीय पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। फिर भी, श्रमिक आंदोलनों की लौ आरोपों से नहीं बुझती, वह हर चुनौती के साथ और प्रखर होती जाती है। आज, ‘गिग’ और असंगठित अर्थव्यवस्था के दौर में श्रमिक अधिकार और गरिमा की यह लड़ाई पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।

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