पूनम शर्मा
समग्र समाचार सेवा
१० जून: भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) पहली बार प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) 2.1 से नीचे गिरकर 1.9 पर पहुंच गई है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त कार्यालय द्वारा जारी नवीनतम सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) रिपोर्ट ने इस बदलाव की पुष्टि की है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय महिलाएं औसतन पहले की तुलना में कम बच्चे पैदा कर रही हैं, जिससे भविष्य में देश की जनसंख्या वृद्धि धीमी पड़ सकती है।
क्या होती है प्रजनन दर?
प्रजनन दर से तात्पर्य किसी महिला द्वारा अपने जीवनकाल में जन्म दिए जाने वाले बच्चों की औसत संख्या से है। विशेषज्ञों के अनुसार 2.1 की प्रजनन दर को जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है। यदि यह दर लगातार इससे नीचे रहती है तो लंबे समय में जनसंख्या घटने लगती है।
भारत में वर्ष 2000 के आसपास यह दर लगभग 3.3 थी, जो अब घटकर 1.9 तक पहुंच गई है। यह बदलाव देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में आए व्यापक परिवर्तनों को दर्शाता है।
प्रजनन दर में गिरावट के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में वृद्धि, गर्भनिरोधक साधनों तक बेहतर पहुंच और परिवार संबंधी निर्णयों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इसके प्रमुख कारण हैं।
इसके अलावा बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत भी परिवारों को कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित कर रही है। शहरी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन-यापन का खर्च लगातार बढ़ रहा है, जिससे छोटे परिवारों की प्रवृत्ति मजबूत हुई है।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण शिशु मृत्यु दर में कमी है। पहले परिवार अधिक बच्चे इसलिए पैदा करते थे क्योंकि बच्चों के जीवित रहने की संभावना कम होती थी। अब स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के कारण यह आवश्यकता कम हो गई है।
राज्यों के बीच बड़ा अंतर
देश के विभिन्न राज्यों में प्रजनन दर में उल्लेखनीय अंतर देखने को मिलता है। बिहार में यह दर 2.9 है, जो देश में सबसे अधिक है। उत्तर प्रदेश 2.6 के साथ दूसरे स्थान पर है।
इसके विपरीत दिल्ली, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह दर 1.2 से 1.3 के बीच है। इन राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और महिलाओं की सामाजिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है।
अर्थव्यवस्था और रोजगार पर प्रभाव
भारत वर्तमान में जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के दौर से गुजर रहा है, जहां कामकाजी आयु वर्ग की आबादी अधिक है। इस स्थिति ने पिछले दो दशकों में आर्थिक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि प्रजनन दर लगातार कम रहती है तो आने वाले 30 से 40 वर्षों में कामकाजी आबादी घट सकती है। इससे श्रमबल की कमी पैदा होगी और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है।
साथ ही बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ेगी, जिससे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
राजनीति पर भी दिख सकता है असर
प्रजनन दर में क्षेत्रीय असमानता का प्रभाव भारतीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। उत्तर भारत के राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वृद्धि होने से भविष्य में संसदीय सीटों के पुनर्वितरण (Delimitation) के दौरान उनका प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।
दक्षिणी राज्यों में इस बात को लेकर चिंता जताई जा रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
भविष्य की चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अब घटती प्रजनन दर को केवल जनसंख्या के नजरिए से नहीं बल्कि वृद्ध होती आबादी की तैयारी के रूप में देखना चाहिए। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, मजबूत पेंशन व्यवस्था और बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम भविष्य की प्राथमिकताएं बन सकती हैं।
भारत अभी भी युवा देश है, लेकिन प्रजनन दर में लगातार गिरावट संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में देश को नई जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।