- गुजरात हाईकोर्ट: केवल पंजीकरण से हिंदू विवाह मान्य नहीं, सप्तपदी जैसी रस्में अनिवार्य
- इस केस में महिला ने कोर्ट में खुद स्वीकार किया कि कोई संस्कार, रस्म या सहजीवन नहीं हुआ
- फैमिली कोर्ट ने विवाह रद्द करने से इनकार किया था, हाईकोर्ट ने आदेश पलटते हुए विवाह को शून्य घोषित किया
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अनुसार, विवाह तभी मान्य है जब रीति-रिवाजों के अनुसार संस्कार हों
- धारा 8: पंजीकरण केवल प्रमाण के लिए, विधिवत संस्कार का विकल्प नहीं
समग्र समाचार सेवा
अहमदाबाद , 24 जुलाई :गुजरात हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सप्तपदी और अन्य आवश्यक हिंदू विवाह रस्में किए बिना केवल विवाह पंजीकरण प्रमाण-पत्र से शादी वैध नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने यह फैसला एक ऐसे मामले में सुनाया, जिसमें एक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी के पिता की कंपनी में काम करते समय बिना उसकी सहमति के विवाह दस्तावेजों पर धोखे से हस्ताक्षर करवा लिए गए, जबकि कोई विधिवत हिंदू विवाह संस्कार या सहजीवन कभी नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह तभी वैध होता है जब वह निर्धारित रीति-रिवाजों व रस्मों के अनुसार संपन्न हो। सप्तपदी यानी अग्नि के समक्ष सात फेरे, जहां आवश्यक हैं, वहां मुख्य आधार हैं। इनकी अनुपस्थिति में महज पंजीकरण से पति-पत्नी का कानूनी रिश्ता नहीं बनता।
मामले में महिला ने लिखित जवाब में स्वीकार किया कि न तो कोई विवाह संस्कार हुआ और न ही दोनों ने पति-पत्नी के रूप में साथ रहना शुरू किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे में विवाह प्रमाण-पत्र का अस्तित्व भी अर्थहीन है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी भारतीय समाज में एक संस्कार है, केवल रजिस्ट्रेशन या समझौता वैध विवाह नहीं बनाता। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को रद्द करते हुए विवाह को शून्य और अमान्य घोषित किया और पति को विवाह पंजीकरण और प्रमाण-पत्र रद्द कराने की छूट दी।