- गोरखपुर विश्वविद्यालय में ‘भारतीय इतिहास-लेखन में नवीन प्रवृत्तियां एवं चुनौतियां’ विषय पर व्याख्यान।
- डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने कहा—इतिहास-लेखन भारतीय चेतना, संस्कृति और परंपराओं के अनुरूप हो।
- प्रो. राजवंत राव ने वैज्ञानिक, तथ्यपरक और निष्पक्ष इतिहास अध्ययन पर बल दिया।
- छात्रों और शोधकर्ताओं से पूर्वाग्रहों से मुक्त रहकर इतिहास की विवेचना की अपील।
समग्र समाचार सेवा
गोरखपुर, 16 अगस्त :पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग में ‘भारतीय इतिहास-लेखन में नवीन प्रवृत्तियां एवं चुनौतियां’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने कहा कि आज के समय में भारत के इतिहास का पुनर्लेखन भारतीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों, सभ्यता, परंपराओं और राष्ट्रीय आदर्शों के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इतिहास-लेखन में भारतीय दृष्टि का केंद्रित होना समकालीन समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजवंत राव (कला संकाय अधिष्ठाता) ने कहा कि इतिहास केवल अतीत की गाथा नहीं, बल्कि भविष्य का मार्गदर्शक भी है। उन्होंने कहा कि युवा शोधार्थियों को पूर्वाग्रहों से मुक्त रहकर, वैज्ञानिक तथ्यों और निष्पक्षता के साथ इतिहास का अध्ययन करना चाहिए।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. प्रज्ञा चतुर्वेदी ने अतिथियों का स्वागत किया और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सत्येंद्र मिश्रा ने आभार व्यक्त किया। आयोजन में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और इतिहास संकलन समिति के पदाधिकारी उपस्थित रहे।