अनिल त्यागी
जंतर-मंतर पर Gen Z ने कुछ दिन शोर मचाया। शोर अब कम हो गया है, लेकिन सरकार के भीतर उसकी गूंज अभी बाकी है। फर्क इतना है कि बाहर नारे लग रहे थे, अंदर सवाल उठ रहे हैं।
प्रधानमंत्री की ताकत पर सवाल उठाने की हिम्मत न भाजपा में है, न सरकार में। असली चिंता प्रधानमंत्री के बाद वाली कतार को लेकर है—वे लोग जो नेता के विजन को मिशन में बदलते हैं। सवाल यह है कि यह कतार कितनी नई है और कितनी पुरानी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 के हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा 78 के और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल 81 के। यानी देश की सुरक्षा और शासन का अनुभव इतना परिपक्व है कि कभी-कभी लगता है, अनुभव खुद रिटायर होने से इनकार कर चुका है।
मंत्रिमंडल में भी यही जवानी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर 71, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी 74 और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल 72। ये सभी अनुभवी हैं, सक्षम हैं और प्रधानमंत्री के भरोसेमंद हैं। मगर बाहर देश में एक नई पीढ़ी पैदा हो चुकी है, जिसकी उम्र वोट देने की है और धैर्य इंस्टाग्राम रील जितना।
अगले लोकसभा चुनाव तक Gen Z और Millennials मतदाताओं का बड़ा हिस्सा होंगे। सरकार के सामने चुनौती केवल देश चलाने की नहीं, देश की नब्ज पहचानने की भी होगी। नब्ज अगर पुराने स्टेथोस्कोप से टटोली जाएगी तो रिपोर्ट सही हो सकती है, मरीज की बेचैनी नहीं।
भाजपा सांसदों के बीच एक और चिंता है—सरकार के भीतर सूचना का रास्ता। भूपेंद्र यादव का प्रसंग इसका प्रतीक बन गया। 3 जुलाई को उनके मंत्रालय के निजी स्टाफ के कुछ लोगों को हटा दिया गया। बताया जाता है कि यादव ने एक वरिष्ठ भाजपा नेता से कहा कि उन्हें इसकी “रत्ती भर भी जानकारी” नहीं थी।
यह लोकतंत्र का नया संस्करण है—मंत्री को अपने मंत्रालय की खबर नहीं, सांसद को अपने कार्यक्रम की सूचना ऊपर से मिलती है और आदेश आता है कि संसद सत्र खत्म होते ही अपने-अपने क्षेत्रों में पहुंचिए।
कभी सरकार जनता को बताती थी कि क्या करना है। अब सवाल यह है कि सरकार को कौन बता रहा है कि क्या करना है?
जंतर-मंतर पर चू-मंतर हो गया। मगर असली जादू अभी बाकी है।